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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ( २७ ) अर्थ - हे मुरारे ! मैं परपुरुषके वास्ते अपने शरीरको नहीं दिया चाहती, नरकसे डरती हूं - हे राधे ! नरकके नाश करनेवालेके अर्थ शरीर देनेसे क्या डर है ? ॥ ४ ॥ त्वां बलवीजारमहर्निशं या सीमन्तिनी गायति किं फलं सा ॥ प्राप्नोति राधे व्यभिचारदोषाद्विमुच्यतेऽसौ भवनागपाशात् ॥ ५ ॥ अर्थ- गोपियों में जार तुमको जो स्त्री रातदिन गाती है ( याद करती है ) वह क्या फल लेती है ? हे राधे ! वह व्यभिचारदोषसे और संसाररूपी नागपाश से छूटती है ॥ ५ ॥ निशावसाने तव विप्रयोगात् प्राणा मदीया विकलीभवन्ति ॥ राधे वद प्राणपतेर्वियोगे प्राणाः कथं नो विकलीभवेयुः ॥ ६ ॥ अर्थ - हे हरे ! रात्रीके अंतमें तुम्हारे वियोग होनेविषे मेर प्राण विकल होते हैं ? हे राधे ! प्राणपतिके वियोग में प्राण विकल क्यों न होवें ? ॥ ६ ॥ For Private and Personal Use Only
SR No.034245
Book TitleRambhashuk Samvad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHariprasad Bhagirath
PublisherHariprasad Bhagirath
Publication Year1825
Total Pages31
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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