SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 18
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir (१७) छबड़ी, नरककी हंडी ( पात्र ), तपको नष्ट करनेवाली, पुण्यको क्षीण करनेवाली, मनुष्योंके ( पुरुषार्थ आदिकों) नाश करनेवाली, ऐसी स्त्री जिसने बहुत कालतक सेवन करी उस नरका जीवन व्यर्थ गया ॥२६॥ ___ रम्भोवाच ॥ समस्तशृङ्गारविनोदशीला लीलावती कोकिलकण्ठनाला॥ विलासिता नो नवयौवनाढ्या वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥ २६ ॥ अर्थ-रंभा कहने लगी-संपूर्ण शृंगार और विनोद ( हावभाव कटाक्ष आदि ) करनेमें चतुर, लीला ( हास्यक्रीडाआदि ) करनेवाली, कोयलके समान मधुर कंठवाली, नवीन यौवनसे युक्त हुई ऐसी सुंदरी स्त्री जिसने नहीं भोगी, उस नरका जीवना व्यर्थ गया ॥ २६ ॥ शुक उवाच ॥ समाधिहन्त्री जनमोहयित्री धर्मे कुमन्त्री कपटस्य तन्त्री॥ सत्कर्महन्त्री कलिता च येन वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ।। २७॥ For Private and Personal Use Only
SR No.034245
Book TitleRambhashuk Samvad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHariprasad Bhagirath
PublisherHariprasad Bhagirath
Publication Year1825
Total Pages31
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy