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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir (१४) तपकी समाधिमें जिसनें अनुभव नहीं किये उस नरका जीवना व्यर्थही गया ॥ १९॥ रम्भोवाच ॥ कठोरपीनस्तनभारनम्रा सुमध्यमा चञ्चलखञ्जनाक्षी॥ हेमन्तकाले रमिता न येन वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥ २० ॥ अर्थ-रंभा कहने लगी-हे मुने ! कठोर भारे स्तन, ( कुचाओं) के भारसे नमी हुई, सुंदरपतली कटीवाली, खंजनपक्षीके नेत्रसमान चंचल नेत्रोंवाली, सुंदरी स्त्रीके संग जिसने हेमन्त ऋतुमें रमण नहीं किया, उस नरका जीवना वृथा गया ॥ २०॥ शुक उवाच ॥ तपोमयो ज्ञानमयो विजन्मा विद्यामयो योगमयः परात्मा ॥ चित्ते धृतो नो तपसि स्थितेन __ वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥ २१ ॥ अर्थ-शुकमुनि बोले-हे रंभे ! तपोमय (सर्व तपमधान ), ज्ञानमय ( सर्व ज्ञानप्रधान ), जन्मरहित, अनंत For Private and Personal Use Only
SR No.034245
Book TitleRambhashuk Samvad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHariprasad Bhagirath
PublisherHariprasad Bhagirath
Publication Year1825
Total Pages31
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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