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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रो अखिल भारतीय जैन विद्वत् परिषद् उद्देश्य एवं प्रवृत्तियां 0 जैन विद्या के अध्ययन-अध्यापन, अनुसंधान, संरक्षण, संवर्धन, लेखन-प्रकाशन, प्रचार-प्रसार आदि में सहयोग देना। - जैन विद्या में निरत विद्वानों, श्रीमन्तों, कार्यकर्ताओं व संस्थाओं में पारस्परिक सम्पर्क व सामञ्जस्य स्थापित करना। 0 जनसाधारण को जैन धर्म, दर्शन, इतिहास, साहित्य, संस्कृति आदि से परिचित कराने के लिए समयसमय पर व्याख्यानमालाओं, शिविरों, संगोष्ठियों, निबन्ध आदि प्रतियोगिताओं का आयोजन करना व सम्बद्ध साहित्य प्रकाशित करना। जीवन-निर्माणकारी सद् साहित्य का निर्माण एवं प्रकाशन करना। ___ सदस्यता-श्रेणियां आजीवन विद्वत् सदस्यता १०१ रु० आजीवन सहयोगी सदस्यता आधार स्तम्भ ५००१ रु० स्तम्भ २५०१ रु० संरक्षक १००१ रु० संवर्धक ५०१ रु० ट्रैक्ट साहित्य सदस्यता १०१ रु० [सदस्य बनने पर १०८ पुस्तकें निःशुल्क भेजी जायेंगी] For Private and Personal Use Only
SR No.034243
Book TitleMrutyu Chintan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorP M Choradia
PublisherAkhil Bhartiya Jain Vidvat Parishad
Publication Year1988
Total Pages49
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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