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________________ २०६ समका विषम करावे, नये पात्रा तैयार करावे, तथा पात्रों संबंधी स्वल्प भी कार्य गृहस्थोंसे करावे. ३ भावार्थ - गृहस्थोंका योग सावध है. अयतनासे करे. मातेतगी रखना पडे, उसकी निष्पत् पैसा दीलाना पडे. इत्यादि दोषोंका संभव है. ( ४१ ),, दांडा (कान परिमाण) लठ्ठी ( शरीर परिमाण ), चीपटी लकडी तथा वांसकी खापटी, कर्दमादि उतारनेके लीये और वांसकी सुइ रजोहरणकी दशी पोनेके लीये – उसको अन्यतीर्थीयों तथा गृहस्थोंके पास समरावे, अच्छी करावे, विषमकी सम करावे इत्यादि. भावना पूर्ववत्. (४२),, पात्राको एक थेगला ( कारी ) लगावे. ३ भावार्थ - विगर फूटे शोभाके निमित्त तथा बहुत दिन चलने के लोभसे थेगलो (कारी ) लगावे. ३ (४३),, पात्रा के फूट जानेपर भी तीन थेगले से अधिक लगावे. ( ४४ ) वह भी विना विधि, अर्थात् अशोभनीय, जो अन्य लोग देख हीलना करे, ऐसा लगावे. ३ (४५) पात्राको अविधिसे बांधे, अर्थात् इधर उधर शिथिल बन्धन लगावे. ( ४६ ) विना कारण एक भी बन्धन से बांधे. ३ ( ४७ ) कारण होनेपर भी तीन बन्धनों से अधिक बन्धन लगाये. ( ४८ ) अगर कोइ आवश्यक्ता होनेपर अधिक बन्धनवाला पात्रा भी ग्रहन करनेका अवसर हुवा तो भी उसे देढ मास से अधिक रखे. ३
SR No.034235
Book TitleShighra Bodh Part 21 To 25
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherSukhsagar Gyan Pracharak Sabha
Publication Year
Total Pages419
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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