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________________ २८० ( १७१ ) एवं वस्त्रादि धोवे, साफ करे, उज्वल करे. घटा मटा उस्तरी दे, गडीबन्ध साफ करे, करावे, करतेको अच्छा समझे. ( १७२ ) एवं वस्त्रादिको सुगंधि पदार्थ लगावें, धूप देकर सुगन्धि बनावे. ३ भावार्थ - विभूषा कर्मबन्धका हेतु है. विषय उत्पन्न करनेका मूल कारण है. संयमसे भ्रष्ट करनेमें अग्रेसर है. इत्यादि दोषोंका संभव है. उपर लिखे १७२ बोलोंसे एक भी बोल सेवन करनेवाले मुनियोंको लघु चातुर्मासिक प्रायश्चित्त होता है. प्रायश्चित्त विधि देखो वीसवा उद्देशासे. इति श्री निशिथ सूत्र – पंदरवा उद्देशाका संक्षिप्त सार. -€(@K+ ( १६ ) श्री निशिथसूत्र – सोलवा उद्देशा. - ( १ ) ' जो कोइ साधु साध्वी' गृहस्थ शय्या - जहांपर दंपती क्रीडाकर्म करते हो, ऐसे स्थानमें प्रवेश करे, करावे, करतेको अच्छा समझे. भावार्थ- वहां जानेसे अनेक विषय विकारकी लेहरों उत्पन्न होती है. पूर्व कीये हुवे बिलास स्मृतिमें आते है इत्यादि दोषका संभव है. ( २ ) " गृहस्थोंके कचापाणी पडा हो, ऐसे स्थान में प्रवेश करे. ३ (३) एवं अग्नि स्थानमें प्रवेश करे.
SR No.034235
Book TitleShighra Bodh Part 21 To 25
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherSukhsagar Gyan Pracharak Sabha
Publication Year
Total Pages419
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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