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________________ ( २१ ) रावन बाम छुआ नहिं चापा । हारे सकल भूप करि दापा । १ । २५५ । ३ (२) ओर निबाहु भाप भाई । करि पितु मातु सुजन सेवकाई । २ । १५१ । ५ 'ओर निबाहु' का अर्थ होता है अंत तक निबाहना । इस का पाठ लोगों ने और निबाहु' वा 'अर निबाहु' बदल दिया है । निम्नलिखित अवतरणों पर ध्यान न देने से यह भूल हुई है । सेवक हम स्वामी सिनाहू । होउ नात यह ओर निबाहू | २ | २३ | ६ प्रनतपाल पालहिं सत्र काहू । देव दुहू दिसि ओर निबाहू । २ । ३१३ | ४ ( पद-पद्म गरीब निवाज के । ) देखिौं जाइ पाइ लोचन फल हित सुर साधु समाज I गई हर ओर निराहक सानक बिगरे साज के ॥ गीतावली ( सुंदर कांड ) पद सं० २६ (मों पै तो न कद्दू है आई । ) ओर निवाहि भी बिवि भायप चल्यौ लषन सो भाई । गीतावली (लंका कांड) पद सं० ६ सरनागत आरत प्रनतनि को दै दै अभय पद ओर निबाहैं । करि आईं, करिहैं करती हैं तुलसीदास दासनि पर छा हैं | गी० (उत्तर कांड) पद सं० १३ दुखित देखि संतन को सोचै जनि मन माहूँ । तोसे पसु पाँवर पातकी परिहरे न सरन गए रघुबर ओर निबाहू । विनयपत्रिका पद सं० २७५ ... (५) सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर | भुवन भुवन देखत फिरौं प्रेरित मोह समीर ॥ ७ । ८१ 'समीर' पाठ लोगों ने बदल कर 'सरीर' कर दिया है। प्रेरणा करने का गुण समीर का है, यथा Aho! Shrutgyanam
SR No.034193
Book TitleBharatiya Sampadan Shastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMulraj Jain
PublisherJain Vidya Bhavan
Publication Year1999
Total Pages85
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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