SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 316
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ परी० १५८ ॥ ॥ १६ ॥ श्रवमा खंमनी ढाल, सातमी कही निपट रसाल हो ॥ ना० ॥ रंग विजयनो शिष्य, नेम प्रणति करे निशदिस हो ॥ ना० ॥ १७ ॥ उदा. दवे कनकमाला प्रते, पूढे शेठ विचार ॥ तुज सम कितनी बात कहे, रे गुणवंती नार ॥ १ ॥ ते बोली पीड सांजलो, सूर्यपुरे नरपाल ॥ भूपति शेव समुद्रदत्त, सागरदत्ता सुकुमाल ॥ २ ॥ तेहनी कुखे उपनो, सागर नामे कुमार || जिनदत्ता बेटी वली, | मातपिता सुखकार ॥ ३ ॥ शेठ कोसंबी नगरने, जिनदत्ते परणी ते ॥ सागर करम वशे करे, व्यसन सातशुं नेट् ॥ ४ ॥ वचन न माने बापनुं, घणी वार तलार ॥ का ली मूक्यो तेहने, गणी शेठ सुत सार ॥ ५ ॥ श्रारक्षक वली एकदा, काली सौंप्यो राय ॥ कोमी जतन जो कीजीए, मूख्य खजाव न जाय ॥ ६ ॥ तेडी तेहना तातने, | राजा जाखे एम ॥ काढ एहने घर थकी, जो तुं वांबे खेम ॥ ७ ॥ दुर्जन जनसंसर्गात् । साधोरपि जवंति विपदो वा ॥ दशमुखकृतेऽपराधे | वारिधिरपि बंधनं प्राप्तः ॥ १ ॥ खंग ॥ १५८
SR No.034172
Book TitleDharmpariksha Ras
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages336
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy