SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 56
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ लेता है, जैसे अधीर कायर पुरुष युद्ध में जाने से पहले ही वनादि में घुस जाने (छिप जाने) की इच्छा (इरादा) कर लेता है ॥३॥ शुष्कतर्कादिकं किञ्चिद्वैद्यकादिकमप्यहो। पठन्ति ते शमनदीं न तु सिद्धान्त-पद्धतिम् ॥४॥ भावार्थ : अहो ! इस प्रकार वैराग्य से सम्पन्न पुरुष शुष्क तर्कशास्त्र तथा वैद्यक आदि के ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं परन्तु शमता (समता) रूपी नदी के समान सिद्धान्त-पद्धति को नहीं पढ़ते ॥४॥ ग्रन्थपल्लवबोधेन, गर्वोष्माणं च बिभ्रति । तत्वान्तं नैव गच्छन्ति प्रशमामृतनिर्झरम् ॥५॥ भावार्थ : दुःखविरक्त साधक ग्रन्थों का पल्लवग्राही (ऊपर-ऊपर से) बोध प्राप्त करके गर्व की गर्मी बढ़ा लेते हैं, किन्तु प्रशमामृत (शान्ति के अमृतमय) झरने के समान तत्त्व (अध्यात्म-रहस्य) को नहीं जानते या तत्त्वज्ञान हासिल नहीं कर पाते ॥५॥ वेषमात्रभृतोऽप्येते, गृहस्थान्नातिशेरते । न पूर्वोत्थायिनो यस्मानापि पश्चानिपातिनः ॥६॥ भावार्थ : ये सिर्फ साधुवेषधारी हैं, ऐसे व्यक्ति गृहस्थों से अधिक (बढ़कर) नहीं हैं। क्योंकि न तो वे पूर्वोत्थायी हैं, और न वे पश्चात्निपाती हैं ॥६।। ५६ अध्यात्मसार
SR No.034147
Book TitleAdhyatma Sara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay
PublisherAshapuran Parshwanath Jain Gyanbhandar
Publication Year2018
Total Pages312
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy