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________________ भावार्थ : अशुद्ध नय की दृष्टि से आत्मा बद्ध और मुक्त होती है, परन्तु शुद्ध नय से तो आत्मा का बन्ध और मोक्ष भी नहीं होता ॥१८९॥ अन्वयव्यतिरेकाभ्यामात्मतत्वविनिश्चयम् । नवेभ्योऽपि हि तत्त्वेभ्यः कुर्यादेवं विचक्षणः ॥ १९० ॥ भावार्थ : इस प्रकार विचक्षण पुरुष को नौ तत्वों से अन्वय और व्यतिरेक द्वारा आत्मतत्व का निश्चय करना चाहिए ॥१९०॥ इदं हि परमाध्यात्मममृतं ह्यद एव च । इदं हि परमं ज्ञानं योगोऽयं परमः स्मृतः ॥१९१॥ भावार्थ : यही उत्कृष्ट अध्यात्म है, यही अमृत है, यही उत्कृष्ट ज्ञान है और यही परम योग कहलाता है ॥१९१॥ गुह्यात् गुह्यतरम् तत्त्वमेतत्सूक्ष्मनयाश्रितम् । न देयं स्वल्पबुद्धीनां ते ह्येतस्य विडम्बकाः ॥१९२॥ भावार्थ : यह गुह्य (रहस्यमय ) से गुह्यतर (अधिक रहस्यमय) तत्व सूक्ष्मनय के आश्रित है । इसलिए अल्पबुद्धि वालों को यह तत्त्व देने योग्य नहीं है । क्योंकि वे (प्रायः) इसकी विडम्बना करने वाले होते हैं ॥ १९२॥ जनानामल्पबुद्धीनां नैतत्तत्वं हितावहम् । निर्बलानां क्षुधात्तीनां भोजनं चक्रिणो यथा ॥ १९३॥ अधिकार अठारहवाँ २७७
SR No.034147
Book TitleAdhyatma Sara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay
PublisherAshapuran Parshwanath Jain Gyanbhandar
Publication Year2018
Total Pages312
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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