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________________ कर लेता है और अध्यात्मराज्य का निष्कंटक उपभोग करता हुआ अन्य कुछ (किसी को) भी नहीं देखता ॥५५॥ श्रेष्ठ हि ज्ञानयोगोऽयमध्यात्मन्येव यज्जगौ । बन्धप्रमोक्षं भगवान् लोकसारे सुनिश्चितम् ॥५६॥ भावार्थ : अध्यात्ममार्ग में यह ज्ञानयोग सबसे श्रेष्ठ है; क्योंकि भगवान् ने लोकसार में अत्यन्त निश्चित बन्ध का मोक्ष है बताया ॥५६॥ उपयोगैकसारत्वादाश्वसंमोहबोधतः । मोक्षाप्तेर्युज्यते चैतत्तथा चोक्तं परैरपि ॥५७॥ भावार्थ : उपयोग ही एकमात्र सार होने से इसीसे शीघ्र सम्मोहरहित बोध होता है । इसलिए मोक्ष की प्राप्ति में यही ( ज्ञानयोग ही) युक्तियुक्त है, अन्य दर्शनकारों ने भी यही कहा है ॥५७॥ तपस्विभ्योऽधिको योगी, ज्ञानिभ्योऽप्यधिको मतः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी, तस्माद्योगी भवार्जुन ॥५८॥ भावार्थ : योगी तपस्वियों से अधिक होता है, (योगी) पण्डितों से भी अधिक माना गया है । कर्म (क्रिया) काण्ड करने वालों से भी योगी अधिक होता है, इसलिए हे अर्जुन ! तू योगी बन ॥५८॥ अधिकार पन्द्रहवाँ १८५
SR No.034147
Book TitleAdhyatma Sara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay
PublisherAshapuran Parshwanath Jain Gyanbhandar
Publication Year2018
Total Pages312
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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