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________________ अधिकार पन्द्रहवाँ [ योग-स्वरूप ] असद्ग्रहव्ययाद् वान्तमिथ्यात्वविषविप्रुषः । सम्यक्त्वशालिनोऽध्यात्मशुद्धेर्योगः प्रसिद्ध्यति ॥ १ ॥ भावार्थ : दुराग्रह के मिट जाने पर जिसने मिथ्यात्वविष-बिन्दुओं का वमन कर दिया है, उस अध्यात्म के शुद्धिकर्त्ता, सम्यक्त्वशाली का योग सिद्ध होता है ॥ १ ॥ कर्मज्ञानविभेदेन स द्विघा तत्र चाऽऽदिमः । आवश्यकादिविहितक्रियारूपः प्रकीर्तितः ॥२॥ भावार्थ : वह योग कर्म और ज्ञान के भेद से दो प्रकार का है । उसमें से प्रथम कर्मयोग को आवश्यकादि विधिविधानरूप क्रियारूप बताया है ॥२॥ शारीरस्पन्दकर्मात्मा, यदयं पुण्यलक्षणम् । कर्मोऽतनोति सद्रागात् कर्मयोगस्ततः स्मृतः ॥३॥ भावार्थ : चूंकि शरीर के स्पन्दन ( हलचल ) रूपी कर्मस्वरूप यह कर्मयोग शुभ रुचि और सद्भाव से प्रेमपूर्वक पुण्यलक्षण वाली क्रिया करता है, इसलिए इसे कर्मयोग कहा गया है ||३|| १६८ अध्यात्मसार
SR No.034147
Book TitleAdhyatma Sara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay
PublisherAshapuran Parshwanath Jain Gyanbhandar
Publication Year2018
Total Pages312
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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