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________________ प्रवचनाब्जविलास - रविप्रभा प्रशमनीरतरंगतरंगिणी | हृदयशुद्धिरूदीर्णमदज्वर - प्रसरनाशविधौ परमौषधम् ॥१३॥ भावार्थ : हृदय की शुद्धि प्रवचनरूपी कमल का विकास करने में सूर्य की प्रभा के समान है । प्रशमजल के तरंगों वाली सरिता है और उदयप्राप्त आठ प्रकार के मदरूपी ज्वर के प्रसार (फैलाव ) को मिटाने के लिए महान् रसायण (औषध) के समान है ॥१३॥ अनुभवामृतकुण्डमनुत्तरव्रत- मरालविलासपयोजिनी । सकलकर्मकलंकविनाशिनी, मनस एव हि शुद्धिरुदाहृता ॥ १४ ॥ भावार्थ : अनुभवरूपी अमृत के कुण्ड के समान महाव्रतरूपी राजहंस के क्रीड़ा करने की कमलिनी के समान तथा समस्त कर्म-कलंक का नाश करने वाली एकमात्र मन की शुद्धि ही कही गई है ॥१४॥ प्रथमतो व्यवहारनयस्थितोऽशुभविकल्पनिवृत्तिपरो भवेत् । शुभविकल्पमयव्रतसेवया हरति कण्टक एव हि कण्टकम् ॥१५॥ भावार्थ : मनः शुद्धि करने के लिए सर्वप्रथम व्यवहारनय में रहकर अशुभ विकल्पों से निवृत्ति के लिए शुभ विकल्पमय महाव्रतों के पालन- आराधन (अर्थात् जीवरक्षा, तप, जप, महाव्रतपालन, अनुष्ठान आदि) में तत्पर हो जाना चाहिए । जैसे कांटा काँटे से निकलता है, वैसे अशुभ ११२ अध्यात्मसार
SR No.034147
Book TitleAdhyatma Sara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay
PublisherAshapuran Parshwanath Jain Gyanbhandar
Publication Year2018
Total Pages312
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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