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श्रमण सूक्त
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जं पि वत्थ व पायं वा
कंबलं पायपुं-छणं। तं पि संजमलज्जट्ठा
धारंति परिहरंति य।।
न सो परिग्गहो वुत्तो
नायपुत्तेण ताइणा। मुच्छा परिग्गहो वुत्तो इइ वुत्त महेसिणा।।
(दस. ६ : १६, २०)
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जो भी वस्त्र, पात्र, कम्बल और रजोहरण हैं, उन्हें मुनि सयम और लज्जा की रक्षा के लिए ही रखते हैं और उनका उपयोग करते हैं।
सब जीवो के त्राता ज्ञातपुत्र महावीर ने वस्त्रादि को परिग्रह नहीं कहा है। मूर्छा परिग्रह है-ऐसा महर्षि (गणधर) ने कहा है।
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