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________________ श्रमण सूक्त २६० धम्मे हरण बभे सतितित्थे अणाविले अत्तपसन्नलेसे । जहिसि हाओ विमलो विसुद्धो सुसीइओ पजहामि दोस ।। एय सिणाण कुसलेहि दिट्ठ महासिणाण इसिण पसत्थ । जहिसि व्हाया विमला विसुद्धा महारिसी उत्तम ठाण पत्त ।। ( उत्त १२ ४६, ४७ ) मुनि का चिन्तन होता है - "अकलुषित एव आत्मा का प्रसन्न - लेश्या वाला धर्म मेरा हृद (जलाशय) है । ब्रह्मचर्य मेरा शान्तितीर्थ है, जहा नहाकर मै विमल, विशुद्ध और सुशीतल होकर कर्म-रज का त्याग करता हू । यह स्नान कुशल पुरुषो द्वारा दृष्ट है। यह महास्नान है। अत ऋषियों के लिए यही प्रशस्त है। इस धर्म-नद मे नहाए हुए महर्षि विमल और विशुद्ध होकर उत्तम स्थान (मुक्ति) को प्राप्त हुए । २६०
SR No.034105
Book TitleShraman Sukt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreechand Rampuriya
PublisherJain Vishva Bharati Samsthan
Publication Year2000
Total Pages490
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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