SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 248
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ PSI _ श्रमण सूक्त । (२४२ अहो । ते निज्जिओ कोहो अहो । ते माणो पराजिओ। अहो । ते निरक्किया माया अहो । ते लोभो वसीकओ।। अहो ! ते अज्जव साहु अहो । ते साहु मद्दव। अहो । ते उत्तमा खती अहो ! ते मुत्ति उत्तमा ।। इहं सि उत्तमो भंते ! पेच्चा होहिसि उत्तमो। लोगुत्तमुत्तम ठाणं सिद्धि गच्छसि नीरओ।। (उत्त. ६ : ५६-५८) देवेन्द्र ने नमि राजर्षि के वैराग्य की प्रशंसा करते हुए कहा-“हे राजर्षि । आश्चर्य है तुमने कोध को जीता है । आश्चर्य है तुमने मान को पराजित किया है । आश्चर्य है तुमने माया को दूर किया है । आश्चर्य है तुमने लोभ को वश मे किया है । अहो। उत्तम है तुम्हारा आर्जव । अहो। उत्तम है तुम्हारा मार्दव । अहो । उत्तम है तुम्हारी क्षमा या सहिष्णुता। अहो ! उत्तम है तुम्हारी निर्लोभता। भगवन् । तुम इस लोक मे भी उत्तम हो और परलोक मे भी उत्तम होओगे। तुम कर्म-रज से मुक्त होकर लोक के सर्वोत्तम स्थान (मोक्ष) को प्राप्त करोगे। - - OR- २४२
SR No.034105
Book TitleShraman Sukt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreechand Rampuriya
PublisherJain Vishva Bharati Samsthan
Publication Year2000
Total Pages490
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy