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________________ श्रमण सूक्त २०४ गामाणुगाम रीयत अणगारं अकिचणं । अरई अणुष्पविसे त तितिक्खे परीसहं । । अरइपिओ किच्चा विरए आयरविक्खए । धम्मारामे निरारभे उवसते मुणी चरे || (उत्त २ १४, १५) एक गाव से दूसरे गाव मे विहार करते हुए अकिंचन मुनि के चित्त मे अरति उत्पन्न हो जाय तो उस परीषह को वह सहन करे । हिंसा आदि से विरत रहने वाला, आत्मा की रक्षा करने वाला, धर्म मे रमण करने वाला, असत्-प्रवृत्ति से दूर रहने वाला, उपशान्त मुनि अरति को दूर कर विहरण करे । २०४
SR No.034105
Book TitleShraman Sukt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreechand Rampuriya
PublisherJain Vishva Bharati Samsthan
Publication Year2000
Total Pages490
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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