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________________ - - श्रमण सूक्त १५४ %3 % 3 न य वुग्गहिय कह कहेज्जा न य कुप्पे निहुइदिए पसते। सजमधुवजोगजुत्ते उवसते अविहेडए जे स भिक्खू ।। जो सहइ हु गामकटए अक्कोसपहारतज्जणाओ य। भयभेरवसद्दसपहासे समसुहदुक्खसहे य जे स भिक्खू ।। (दस १० १०.११) Avaimer - जो कलहकारी कथा नहीं करता, जो कोप नहीं करता, जिसकी इन्द्रियाँ अनुद्धत हैं, जो प्रशान्त है, जो सयम मे ध्रुवयोगी है, जो उपशात है, जो दूसरो को तिरस्कृत नहीं करता-वह भिक्षु है। जो काटें के समान चुभने वाले इन्द्रिय-विषयो, आक्रोशवचनो, प्रहारो, तर्जनाओ और बेताल आदि के अत्यन्त भयानक शब्दयुक्त अट्टहासो को सहन करता है तथा सुख और दुःख को समभावपूर्वक सहन करता है-वह भिक्षु है। - - -
SR No.034105
Book TitleShraman Sukt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreechand Rampuriya
PublisherJain Vishva Bharati Samsthan
Publication Year2000
Total Pages490
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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