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________________ आगम और आगमेतर स्रोत २६ भावना का तात्पर्य पासनाहचरिअं पृ० ४६० • भाविज्जइ वासिज्जइ, जीए जीवो विसुद्धचेट्टाए । सा भावण त्ति वुच्चइ. || जिस विषय का अनुचिन्तन बार-बार किया जाता है या जिस प्रवृत्ति का वार-वार अभ्यास किया जाता है, उससे मन प्रभावित हो जाता है, इसलिए उस चिन्तन या अभ्यास को भावना कहा जाता है । भावना पणवीस भावणाहि उद्देसेसु दसाइण । · जे भिक्खू जयई निच्च से न अच्छइ मंडले । । उत्तरज्झयणाणि ३१ ।१७ जो भिक्खू पच्चीस भावनाओं और दशाश्रुतस्कंध, व्यवहार और वृहत्कल्प के छब्बीस उद्देशो मे सदा यत्न करता है वह ससार मे नही रहता । धर्म्य ध्यान की चार अनुप्रेक्षाएं • धम्मस्स ण झाणस्स चत्तारि अणुप्पेहाओ पण्णत्ताओ, त जहागाणुप्पेहा, अणिञ्चाणुप्पेहा, असरणाणुप्पेहा, ससाराणुप्पेहा, ठाणं ४ । ६८ धर्म्य ध्यान की चार अनुप्रेक्षाएं है अर्थात् धर्म्यध्यान के पश्चात् चार अनुप्रेक्षाओं का अभ्यास किया जाता है—–एकत्व, अनित्य, अशरण एव ससार अनुप्रेक्षा । शुक्ल ध्यान की चार अनुप्रेक्षाएं • सुक्कस्स ण झाणस्स चत्तारि अणुप्पेहाओ पण्णत्ताओ, तं जहाअणतवत्तियाणुप्पेहा, विपरिणामाणुप्पेहा, असुभाणुप्पेहा, अवायाणुप्पेहा । ठाण ४ । ७२ शुक्ल ध्यान की चार अनुप्रेक्षाए है- अनन्तवृत्तितानुप्रेक्षा, विपरिणाम अनुप्रेक्षा, अशुभ अनुप्रेक्षा, अपाय अनुप्रेक्षा ।
SR No.034100
Book TitlePreksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages41
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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