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________________ ईश्वराकृष्टाः= / ईश्वर करके ३२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स० च और | तनिर्वासनम्_ / उस वासना-रहित ते-वे पुरुषम् । पुरुष को Sप्रियवादी अर्थात् कृतचाटा संसारी पुरुष । स्वयम् स्वतः आगत्य आकर । प्रेरित हुए सेवन्ते सेवन करते हैं। भावार्थ । क्योंकि वासना-रहित पुरुष-रूपी सिंह को देखकर, विषय-रूपी हस्ती असमर्थ होकर भाग जाता है। और ऐसे ही नरसिंह की प्रतिष्ठा और सेवा इतर पुरुष ईश्वर करके प्रेरित हुए करते हैं ।। ४६ ॥ मूलम् । न मुक्तिकारिकान्धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः । पश्यञ्च्छृण्वन्स्पृशजिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ ४७ ॥ पदच्छेदः । न, मुक्तिकारिकाम्, धत्ते, निःशङ्कः, युक्तमानसः, पश्यन्, श्रृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, आस्ते, यथासुखम् ॥ अन्वयः। शब्दार्थ । | अन्वयः। शब्दार्थ । निःशङ्कः-शङ्का-रहित आग्रहात्-आग्रह से च-और न धत्ते नहीं धारण करता है युक्तमानस: निश्चल मनवाला ज्ञानी ज्ञानी किन्तु-परन्तु मुक्तिका- _ [ यमनियमादि योग पश्यन-देखता हुआ रिकाम्। क्रिया को श्रृण्वन् सुनता हुआ
SR No.034087
Book TitleAstavakra Gita
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRaibahaddur Babu Jalimsinh
PublisherTejkumar Press
Publication Year1971
Total Pages405
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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