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________________ सप्तदशः सर्गः। 1077 सारभूतानि धर्मरहस्यानि, कृन्तति ? छिनत्ति ? इति उच्चैः तारम् , अबोचत् अकथ. यत् , शक्र इति शेषः // 83 // इस प्रकार ( 17 / 36-82, श्रुति-स्मृति-पुराण-प्रतिपादित धर्मकी निन्दा करनेवाले ) दूषित अक्षरोंको सुनकर इन्द्र क्रद्ध हो गये और 'धर्मकी जड़को यह कौन काट रहा है ?? ऐसा ऊँचे स्वरसे बोले / / 83 // लोकत्रयीं त्रयीनेत्रां वज्रवीर्यस्फुरत्करे / ___ क इत्थं भाषते पाक-शासने मयि शासति ? // 4 // लोकेति। त्रयीनेत्रां बाह्यप्रत्यक्षाविषयपदार्थज्ञापकवेदत्रयचतुषं, लोकत्रयों त्रिलोकी, वज्रवीर्येण कुलिशप्रभावेण, स्फुरत्कारे दीप्यमानहस्ते, पाकशासने पाकासुर. घातिनि, एतेन धर्मदूषकाणां हननसामर्थ्य स्वस्य सूचितम् / मयि देवेन्द्रे शासति दण्डयति, धर्मसंस्थापनपूर्वकं पालयति सतीत्यर्थः / क इत्थम् एवं, धर्मदूषणादिरूप. मित्यर्थः / भाषते ? प्रलपति ? // 84 // त्रयी ( ऋक् यजुष और सामवेद ) हैं नेत्र जिसके ऐसे तीनों लोकोंका वज्रके बलसे स्फुरित होते हुए बाहुवाले मुझ इन्द्र के शासन करते रहनेपर कौन ऐसा (17 / 36-82) कहता है ? [ त्रयीको लोकका नेत्र कहनेसे वेदकी लोकका सच्चा मार्ग-प्रदर्शक होना तथा वज्रके बलसे स्फुरित होते हुए बाहुवाला कहनेसे ऐसे धर्ममूलोच्छेदक वचन कहनेवालेका दण्डित करमेकी शक्ति होना एवं मुझको कहनेसे क्रोधपूर्वक वज्रका स्पर्शकर उक्त वाक्य कहना सूचित होता है ] // 84 // वर्णासङ्कीर्णतायां वा जात्यलोपेऽन्यथाऽपि वा / ब्रह्महादेः परीक्षासु भङ्गमङ्ग! प्रमाणय // 85 // . 'शुद्धं वंशद्वयीशुद्धौ इत्यादिश्लोकद्वयेन (1739-40) यत् सर्वस्यैव जातिदूषणमुक्तं तत् परिहरति-वर्णेत्यादि। वर्णानां ब्राह्मणादिवर्णानाम्, असङ्कीर्णतायाम् असाथै वा, योनिसाङ्कर्याभावे वा इत्यर्थः / अन्यथाऽपि प्रकारान्तरेणापि वा, वाणिज्यादिनिषिद्धवृत्याश्रयणेन इत्यर्थः, जात्यलोपे जातिभ्रंशाभावे, जातिशुद्धिविषये इत्यर्थः / ब्रह्महादेः ब्रह्महत्यादिकारिणः पापिनः, परीक्षासु तुलादिदिव्यबाधनेषु, भङ्गं पराजयम् , अङ्ग ! भोः !, प्रमाणय प्रमाणवेनावाच्छ इत्यर्थः / यदि ब्राह्मणत्वादि. जातिशुद्धिन स्यात् , तदा नाहं ब्राह्मणहन्तेति दिव्यकारिणः ब्राह्मणादिहन्तु शुद्धस्वादिज्ञापकेषु स्मृतिशास्त्रायुक्तेषु जलानलतुलादिदिव्यशोधनेषु कथं पराजयः स्यात् ? अतस्तत्र पराजय एव जातिशुद्धौ प्रमाणमिति भावः / / 85 // (अब पूर्वोक्त (18139-40 ) पक्षोंका अग्रिम दो (17385-85) श्लोकोंसे खण्डन करते हैं-) हे अङ्ग ! वर्णोका साकर्य (धर्मसङ्कीर्णता) नहीं होनेपर अथवा प्रकारान्तरसे अर्थात् व्यापार आदि स्वजनित विरुद्ध निषिद्ध वृत्तिका आश्रय करनेसे नातिनाश नहीं
SR No.032782
Book TitleNaishadh Mahakavyam Uttararddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1997
Total Pages922
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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