________________ 1022 नैषधमहाकाव्यम् / लिए उत्कण्ठित ) भ्रमरोंसे मिलता है। [ स्वयंवरमें जाते समय नगररक्षार्थ नियुक्त और उनके लौटनेपर स्त्रीसहित नलको देखने के कौतूहलसे उत्कण्ठित श्रेष्ठ मन्त्रिगण नलकी अगवानी करने के लिए आये तो उनसे नलका मिलाप हुआ ] // 123 // कियदपि कथयन् स्ववृत्तजातं श्रवणकुतूहलचनलेषु तेषु / कियदपि निजदेशवृत्तमेभ्यः श्रवणपथं स नयन् पुरी विवेश / / 124 / / कियदिति / सः नलः, श्रवणकुतूहलेन स्वयंवरवृत्तान्तश्रवणकौतूहलेन, चञ्चलेषु व्यग्रेषु, तेषु अमात्येषु विषये, स्ववृत्तजातं स्वचरितसमूहम्, इन्द्रादीनां दौत्यादि। रूपं मुख्यं कर्मसमूहमित्यर्थः, कियत् अपि स्तोक, सङ्क्षपेण इत्यर्थः, कथयन् वर्णयन्, तथा निजदेशवृत्तं स्वराष्ट्रवृत्तान्तम्, एभ्यः अमात्येभ्यः सकाशात्, कियत् अपि किञ्चित् , श्रवणपथं श्रुतिमार्ग, नयन् प्रापयन् , शृण्वन् इत्यर्थः, पुरी नगरं विवेश प्रविष्टवान् // 124 // ( स्वयंवर-वृत्तान्तको ) सुननेके कुतूहलमें चञ्चल उन ( मन्त्रियों ) से अपने समाचारसमूह ( पाठा०-स्वयंवरमें हुए समाचार ) को कुछ अर्थात् संक्षेपमें ( इन्द्रादिका दूत बनना तथा उनका कपटरूप धारण करना आदि मुख्य-मुख्य समाचार ) कहते हुए और इन (मन्त्रियों) से अपने देशके समाचारको कुछ अर्थात् मुख्य-मुख्य सुनते हुए वे नल पुरीमें प्रवेश किये। [ स्वयंवर के समाचारको सुनने के लिए कौतूहलवश वे मन्त्रिगण बहुत चन्नल हो रहे थे, अत एव उनको अपना मुख्य-मुख्य कुछ समाचार कहते तथा अपने देशका कुछ समाचार उससे सुनते हुए नलने राजधानीमें प्रवेश किया। बाहरसे आनेवालोंसे वहांके समाचार सुननेका कौतुक वहां नहीं गये हुए लोगोंमें होना और बाहरसे लौटे हुए व्यक्तिका अपने देशके समाचार सुननेकी इच्छा होना और परस्परमें एक दूसरेसे संक्षिप्त कहतेसुनते नगरमें प्रवेश करना लोक व्यवहार में भी देखा जाता है ] // 124 // अथ पथि पथि लाजैरात्मनो बाहुवल्लीमुकुलकुलसकुल्यैः पूजयन्त्यो जयेति / क्षितिपतिमुपनेमुस्तं दधाना जनानाममृतजलमृणालीसौकुमार्य कुमार्यः / / अथेति / अथ पुरप्रवेशानन्तरं पथि पथि प्रतिमार्गम्, अमृतजलस्य सुधोदकस्य, या मृणाली मृणालम्, अमृतजलोत्पन्ना या बिसतन्तुरित्यर्थः, तद्वत् सौकुमार्य कोमलतां, दधानाः धारयन्त्यः, कोमलाङ्गयः इत्यर्थः, कुमार्यः अविवाहिता नार्यः, आत्मनः स्वस्य, बाहुवल्लीनां भुजलतानां, मुकुलकुलसकुल्यैः कुड्मलोत्करतुल्यैः, लाजैः भृष्टधान्योद्भवः, जय विजयीभव, इति जयशब्दपूर्वमित्यर्थः, पूजयन्त्यः सत्यः, जनानां समागतलोकानां मध्ये, तं क्षितिपतिं नलम्, उपनेमुः उपतस्थिरे इत्यर्थः॥ इस ( पुरीमें प्रवेश करने ) के बाद प्रत्येक मार्गमें अमृतजलोत्पन्न बिसतन्तु ( मृणालकमलनाल ) को सुकुमारताको धारण करती हुई अर्थात् उक्त मृणालके समान कोमल 1. 'कथयनमुन्न जातम्' इति पाठान्तरम् /