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________________ नैषधमहाकाव्यम् / अयमिति / अयं महेन्द्रनाथः, आयातः किल इतीरिणाम् इतिवादिनां, पौराणां वाग्भ्यो जनवादेभ्यः, भयात् अस्य रिपुर्वृथा वनम् अयात् ; वृथात्वमेवाह-श्रुताः आकर्णिताः, शुकैरिति भावः, तान्येव अक्षराणि अयमायातः किलेत्येवंरूपाणि यासु ताः तदक्षराः, तस्य एतदीयरिपोः, उत्स्वापगिरो वासनायातान् उत्स्वप्नायितप्रला. पान् , पठद्भिः उच्चारयद्भिः, शुकैर्वनेऽपि सः रिपुः, अत्रासि त्रासितः, सेय॑न्तात् कर्मणि लुङ् / अत्र सत्यपि त्रासनिवृत्तिकारणे शुकवाक्यनिमित्तेन तदुत्पत्तेः, उक्तनि. मित्तरूपो विशेषोक्तिभेदः अलङ्कारः, 'कारणसामग्रयां कार्यानुत्पत्तिविशेषोक्तिः' इति सामान्यलक्षणात् // 25 // _ 'यह ( कलिङ्गका राजा ) आ गया' ऐसे कहनेवाले नागरिकोंके वचनसे शत्रु वनको व्यर्थ ही गये ( क्योंकि ) वहां भी उन शत्रुओंके दुःस्वप्न (वरीना-सोनेके समय में बोलना ) के वचनके उन अक्षरों 'यह कलिङ्गराज आ गया' को बोलते हुए शुकोले वनमें भी वे शत्रु डर गये। [नागरिकों के कहनेसे यद्यपि शत्रु वनमें भाग गये; तथापि वहां जाकर सोते समय 'यह कलिगराज आ गया' इस प्रकार स्वप्नमें बार बार कहे गये शत्रुओंके वचनोंको तोते भी कहने लगे, जिसे सुन कर वे शत्रु इस कलिङ्गराजाको वास्तविकमें आया समझकर वहां भी डर गये, अत एव उनका वनमें भागना व्यर्थ ही हुआ] // 25 / / इतस्त्रसद्विद्रुतभूभृदुज्झिता प्रियाऽथ दृष्टा वनमानवीजनैः / शशंस पृष्टाऽद्भुतमात्मदेशजं शशित्विषः शीतलशीलतां किल / / 26 // इत इति / इतः अस्मात् महेन्द्रनाथात् , त्रसता बिभ्यता, अत एव विद्रुतेन पलायितेन, भूभृता प्रतिपक्षभूभुजा, उज्झिता वने त्यक्ता, प्रिया तत्कान्ता वनमान वीजनैः किरातीजनैः, दृष्टा; अथ दर्शनानन्तरम् , आत्मदेशजम् अद्भुतं त्वद्देशे किमद्भुतमस्तीति पृष्टा सती, अप्रधाने दुहादीनामित्यप्रधाने कर्मणि क्तः, शशित्विषः चन्द्रिकायाः, शीतलशीलतां शिशिरस्वभावतां, शशंस किल कथयामास खलु; अभिनवप्राप्तविरहाया मुग्धायाः चन्द्रकिरणानां विरहे दुःसहत्वमजानन्त्याः स्वदेशे शीतलत्वमत्र वने च उष्णत्वमिति भ्रान्तिरिति भावः // 26 // इस ( कलिङ्गराज ) से डरकर भगे हुए राजासे छोड़ी गयी ( उसकी) प्रियाको किरातपत्नियोंने देखा और अपने देशकी अद्भुत वस्तुको पूछा तो उस (पति-विरहित रानी) ने चन्द्रकिरणकी शीतलता को बतलाया। [भगते हुए पति से छोड़े जाने के कारण चन्द्रकिरण सन्ताप दे रही थी, अतः किरातियोंके पूछनेपर उसने चन्द्र-किरणको अपने देशका अद्भुत पदार्थ बतलाया ] // 26 // इतोऽपि किं वीरयसे ? न कुर्वतो नृपान् धनुर्बाणगुणैर्वशंवदान् / गुणेन शुद्धन विधाय निर्भरं तमेनमुरूवलयोर्वशी वशम् / / 27 // 1. 'निर्भयम्' इति पा०।
SR No.032782
Book TitleNaishadh Mahakavyam Uttararddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1997
Total Pages922
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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