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________________ प्रथमः सर्गः। 3. समय बो नल दमयन्तीके उद्देश्यसे मूपिछत हुए, उसे लोगोंने समझा कि वे बोणाके मच्छनानन्दजन्य मानन्दातिशयसे नेवनिमोनादि कर रहे है, अतः उसे भी कोई पहचान नहीं सका। अथवा-उक्त मूच्र्छनाके समयमें समाज ही मूञ्छित (भानन्दातिशयसे तन्मय ) हो गया, अतएव अलीका दमयन्तीके प्रति किया गया नसोक्त माषण कोई नहीं सुन सका / [ अथवा "उक्त मूच्र्छनाकाऊमें समाज मूच्छित हो गया, अतएव वह अलीकदृष्ट दमयंतीके प्रति किये गये भाषणको नहीं सुन सका, किन्तु उसे वे नल काम देवसे नहीं छिपा सके अर्थात कामदेवने तो उनके उक्त माषणको समझ ही लिया ] // 52 // अवाप सापत्रतां स भूपतिर्जितेन्द्रियाणां धुरि कीर्तितस्थितिः / असंवरे शम्बरवैरिविक्रमे क्रमेण तत्र स्फुटतामुपेयुषि // 53 // अवापेति / जितेन्द्रियाणां धुर्यभ्रे कीर्तितस्थितिः स्तुतमर्यादः स भूपतिः नमः तत्र समाजे असंवरे संवरितुमशक्ये संवरणं संवरः शमश्चेत्यपि, न विद्यते संवरो यस्य तस्मिन् शम्बरवैरिविक्रमे मनसिप्रविकारे क्रमेण स्फुटतामुपेयुषि सति साप. प्रपतां सलजताम् अवाप / धैर्यशालिनां ताम्रपाकर इति भावः // 53 // जितेन्द्रियों के अग्रणी वे राजा नल उस समाम ( जन-समूह ) में अगोपनीय काम पराक्रम ( कामजन्य पाण्डुतादि विकार ) के क्रमशः स्पष्ट हो जाने पर लज्जित हो गये। [ लोगोंने धीरे धीरे नस्के कामजन्य विकार को जान लिया ] // 53 // अलं नलं रोदुधुममी किलाभवन् गुणा विवेकप्रभवा न चापलम् / स्मरः स रत्यानिरुद्धमेव यत्सृजत्ययं सर्गनिसर्ग ईदृशः // 54 // ननु विवेकिनः कुत इदं चापल्यम् ? इत्यत आह-अलमिति / युक्तायुक्तविचारो विवेकः तत्प्रभवा अमी गुणा धैर्यादयः नलमिदं स्त्रीलाभरूपं चापलं निरोधुम 'दुहियाची त्यादिना रुन्धेईिकर्मकरवम् / अलं समर्था नाभवन् किल खलु / तथाहिस्मरः कामः / जनमिति शेषः / जनं रत्या रागे अनिरुद्धं सृजति भनीश्वरमवशंकोति रत्या रतिदेण्यामनिरुद्धास्यं कुमारं सृजतीति ध्वनिः / इति यत् अयं सर्गनिसर्गः सृष्टिस्वभाव ईदृशः / रतिः स्मरप्रियायां च रागेऽपि सुरतेऽपि च'। अनिरुद्धः काम. श्रेढे चानीश्वरेऽपि चेति विश्वः / अत्र स्मररागारतायाः सर्वसुटिसाधारयन चापलदुर्वारतासमर्थनात सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽन्तरन्यासः // 54 // ये प्रसिद्ध विबेक आदि गुण नककी चपलताको नहीं रोक सके, क्योंदि कामदेव रात ( अनुराग ) होनेपर चपलताको ही सृष्टि करता है, यही सृष्टि का नियम है। यया कामदेव रतिकालमें चपलताकी ही सृष्टि करता है अर्थात् रतिकालमें तमो चञ्चल हो जाते है, अयवा-कामदेव 'रति' नामको अपनी प्रिया 'अनिरुद' नायक पुत्र को ही हरन करता है, यहो सृष्टिका नियम है)। [दिदेकादिगुणयुक्त भी नल दमयन्ती विर अन्य कामपीडासे अतिशय चन्चल हो गये] // 54 //
SR No.032781
Book TitleNaishadh Mahakavyam Purvarddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1976
Total Pages770
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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