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________________ 444 अष्टमः सर्गः। देवके पुष्पम्य बाणोंसे अग्नि इतना पीडित हो रहे हैं कि पूजामें चढ़ाये गये पुष्पको भी उसे काम-बाण समझकर भयभीत हो जाते हैं ] लोकमें भी किसीसे पीडित व्यक्ति पीड़ा देने के उद्देश्यसे नहीं आने पर भी उसे देखकर यह मुझे पीडित करनेके लिये ही आया है, ऐसा समझकर भयभीत हो जाता है ] // 75 // स्मरेन्धने वक्षसि तेन दत्ता संवतिका शैवजवल्लिचित्रा। चकास्ति' चेतोभवपावकस्य धूमाविला कीलपरम्परेव / / 76 // स्मरेन्धन इति / तेनाग्निना स्मरेन्धने कामाग्निदाटे वक्षसि दत्ता तापशा. न्तये न्यस्ता शैवलवल्लिभिश्चित्रा कर्बुरा संवर्तिका नवदलम् / 'संवर्तिका नवदलं वीजकोशो वराटकः' इत्यमरः। चेतोभवपावकस्य कामाग्ने माविला कीलपरम्परा ज्वालावलिरिव चकास्ति दीप्यते / 'वद्वयोर्खालकीलौ' इत्यमरः // 76 // उस ( अग्नि ) के द्वारा कामदेवके इन्धन ( अपनी) छातीपर रखा हुए शैवाल-लतासे चित्रित (कर्बुर) कमल कामाग्निके धूम-मलिन ज्वाला-समूहके समान शोभित होता है / [ कामदेव तुमसे विरहित अग्निके हृदयको जलाता है, अतः कामस्वरूप अग्निका इन्धन ( दाह्य पदार्थ ) अग्निका हृदय हुआ, इसके अतिशय सन्तप्त होनेसे अग्नि अपनी छातीपर शीतलताके लिये शैवालयुक्त कमल रख लिये, उनमें शैवाल तो कामरूप अग्निके धूमके समान तथा कमल पिङ्गलवर्ण ज्वालाके समान शोभते अर्थात् मालूम पड़ते हैं / तुमसे विर• हित अग्निको कामदेव अत्यन्त सन्तप्त कर रहा है ] / / 76 // पुत्री सुहृद्येन सरोरुहाणां यत्प्रेयसी चन्दनवासिता दिक् / धैर्य विभुः सोऽपि तवैव हेतोः स्मरप्रतापज्वलने जुहाव // 77 / / अथ यमस्य विरहावस्था वर्णयति-पुत्रीति / येन सरोरुहाणां सुहृत्सूर्यः पुत्री पुत्रवान् एतेनाभिजन उक्तः / चन्दनैर्मलयजैः दुमैर्वासिता सुरभिता दिक दक्षिणा यस्प्रेयसी यस्य प्रियतमा एतेन भोगसम्पत्तिरुक्ता / स विभुर्वैवस्वतोऽपि तवैव हेतो. स्त्वनिमित्तादेव / 'षष्ठी हेतुप्रयोगे' इति षष्ठी। धैर्य स्मरस्य प्रतापज्वलने प्रतापानी जुहाव / परवशो वर्तत इत्यर्थः॥ 77 // ( अब (श्लोक० 77 से 79 तक ) नल यमका दूत कार्य करना आरम्भ करते हैं-) कमलों के मित्र (सूर्य) जिससे पुत्रवान् हैं तथा चन्दन (चन्दन वृक्ष, पक्षा०-चन्दनलेप) से सुवासित दिशा अर्थात् दक्षिण दिशा जिसकी परम प्रिया स्त्री हैं, सर्वसमर्थ वह ( यम ) भी तुम्हारे ही कारणसे ( अपने ) धैर्यको कामदेवके प्रतापरूपी अग्निमें जला दिये हैं। [प्रथम पादसे यमका उत्तम कुल तथा द्वितीय पादसे भोग सम्पत्तिका उल्लेख किया गया है। अतः उत्तम कुलोत्पन्न तथा भोग साधन सम्पन्न भी यम तुम्हारे लिये कामपीडित होकर अपना धैर्य छोड़ रहैं हैं / अथ च जिसके पिता (सूर्य) कमलों के मित्र हैं तथा परम प्रिया चन्दनसे 1. "रराज" इति पाठान्तरम् /
SR No.032781
Book TitleNaishadh Mahakavyam Purvarddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1976
Total Pages770
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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