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________________ नैषधमहाकाव्यम् / कथांशको सूचना इस पथके द्वारा मिलती है। दो शत्रोंवाले योगाद्वारा एक शखबाले योगा का अनायास पराजित होना स्वाभाविक ही है ] // 64 // आत्मंघ तातस्य चतुर्भुजस्य जातश्चतु:रुचिर.' स्मरोऽपि / तचापयोः कर्णलते भ्रगेऽये वशत्वगंशी चिपिटे' किमस्याः / / 4 / / आस्मेति / चतुर्भुजस्य चतुर्बाहोः तातस्य स्वजनकस्य विष्णोरास्मा स्वरूपमेव जातः / "भारमा वै पुत्रनामासि" इति श्रुतेः स्मरोऽपि चतुर्दोभिः चतुर्बाहुर्भिः हचिरः तस्य चतुर्थहोः स्मरस्य चापयोरस्या भ्रवोः अस्या एवं कर्गों लतेव वंशस्य स्वक्सारस्य स्वर्गशौ स्वग्भागमयो चिपिटे अनते ऋजू इत्यर्थः। "इनस्पिटविकचि ." इति ने पिटच प्रत्यये नेचिरादेशः / नासान्तवाचिना तस्वमात्र लण्यते / ज्ये मोज्यौं किम् / 'मौर्वी ज्या शिजिनी गुणः' इत्यमरः / अत्र स्मरस्य चतुर्भुजस्वं ततो भैमीवास्तचापगत्वं तस्कर्णयोरेव उपारवंच उस्प्रेच्यते // 15 // चार भुजाओवाले पिता ( श्रीकृष्ण भगवान् ) आस्मारूप उत्पन्न हुमा कामदेव भी चार भुजाओं वाला रुचिकर (पाठा०-उचित ही) दुआ है, अथवा-कामदेवका चतुर्भुज होना उचित . ( श्योंकि यह ) चतुर्भुज पिता (श्रीकृष्ण भगवान् ) का स्वरूप ही है / उस चतुर्नुज कामदेयके ( दमयन्तीका ) भ्ररूप दी धनुर्षोंकी, दमयन्तीके कर्णलतारूपी बांसके स्वक् ( ऊपरी ) भाग दो प्रत्यश्चापं. है क्या ? [ कामदेव के पिता कृष्ण भगवान् चतुर्भुज है, अत एव 'आत्मा के पुत्रनामासि' इस वेदवाक्य के अनुसार कामदेव भी चतुर्भुज उत्पन्न हुआ है, यह ठीक ही है, चतुर्भुज कामदेवके दो धनुष दमयन्तीके दोनों भ्र है तथा उनकी प्रत्यचा (डोरी) दमयन्तीकी दोनों कर्णलताई हैं / विना चढ़ाये हुए धनुको प्रत्यचा धनुषके कोणमें रहती है और दोनों कर्णलतापं. भी भ्रूद्वयरूप धनुषके कोणमें हैं। ] // 65 / / ग्रीवाद्भुतवावटुशोभितापि प्रसाधिता माणवकेन सेयम् / आतिग्यतामध्यवलम्बमाना संरूपताभागखिलोकाया // 33 // प्रीवेति / या ग्रीवा बटुना माणवकेन शोभिता अलंकृता न भवतीत्यवटुशोमिता / तथापि माणवकेन बटुना प्रसाधितेति विरोधः / 'अपिर्विरोधे। अषटुशो. मिता काटिकालंकृता / 'भवटुर्धाटा कृकाटिका' इत्यमरः। माणवकेन विंशतिसरेण मुक्ता हारेण प्रसाधितेति विरोधः। 'विंशतिसरो माणवकोऽल्पस्वात्' इति क्षीरस्वामी। 'भवेन्माणवको हारभेदे याले कुपूरुपे' इत्यभिधेयः / किश, आलिगयतामालिङ्गनीयस्वमवलम्वमानाप्याश्रयन्त्यपि सरूपताभाक सारूप्ययोगी अखिलोऽन्यून उर्वक मालिजयत्वम् इति भावप्रधानो निर्देशः / यस्याः सा। 'अब्दयालिग्योलकात्रयः' 1. "-हचितः" पाठान्तरम् / 2. "चिपिटी" इति पाठान्तरम् / 3. "सुरूपता... ''काया" इति पाठान्तरम् /
SR No.032781
Book TitleNaishadh Mahakavyam Purvarddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1976
Total Pages770
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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