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________________ 274 नैषधमहाकाव्यम्। नहीं करता ? अर्थात् समी करते हैं (क्योंकि साक्षात् अनुभूत विषयमें अविश्वास करनेका कोई कारण नहीं होता है)। अथवा-संसारमें लोग पायः सोमान् व्यक्तियों की झूठी प्रशंसा किया करते हैं, किन्तु तुम्हारी झूठी प्रशंसा नहीं करते, ऐसा कोई परममित्र या भाप्त या अनुभव हो साक्षात कह रहा है तो कौन विश्वास नहीं करेगा ? अर्थात् सब करेंगे। अन्य व्यक्ति सम्पत्ति होने पर विनयको छोड़ देते हैं, किन्तु तुम इतनो अपार सम्पत्ति पाकर भी विनयी हो, यह बात प्रत्यक्ष अनुभवसे ही विश्वासके योग्य है ] // 22 // श्रीभरानतिथिसात्करवाणि स्वोपभोगपरता न हितेति / पश्यतो बहिरिवान्तरपीयं दृष्टिसृष्टिरधिका तव कापि // 23 // श्रीभरानिति / श्रीभरान् सम्पदुच्छूपान् , अतिथिसात् दानेनातिथ्यधीनं, 'देये प्राच' इति चकारात् सातिप्रत्ययः / करवाणि कुर्याम् / विध्यर्थे लोट / 'आहु. समस्य पिच्च' इति मेनिः / स्वोपभोगपरता आत्मम्भरित्वं, न हिता न श्रेयस्करीति पश्यतो जानतः प्रेक्षमाणस्य च तव बहिरिव देह इव अन्तरास्मन्यपि कापीयं दृष्टिः सृष्टिः ज्ञानवृष्टिरक्षिसृष्टिश्च / 'दृष्टिानेऽपिर्शने' इत्यमरः। अधिका असाधारणी, द्वयोरपि दृष्टयोः श्लिष्टशब्दोपात्तयोरभेदाभ्यवसायेन बहिरिवेत्युपमा // 23 // ___ 'समस्त सम्पत्तिको दान देकर अतिथियों के अधीन कर दूं, उनका अपने लिए ही उपभोग हितकर नहीं है' इस प्रकार अन्तःकरणमें भी बाहरके समान देखते हुए कोई अर्थात् लोकोत्तर या अनिर्वचनीय तुम्हारी दृष्टि रचना है। [जिप्त प्रकार सहस्र नेत्र होनेसे बाहरमें तुम्हारी दृष्टि-रचना लोकोत्तर है, उसी प्रकार मनमें उक्त उत्तम विचार करनेसे तुम्हारी शानदृष्टि भी लोकोत्तर अनिर्वचनोय हैं, तुमसे अधिक विचारवान् नहीं है ] // 23 // आः स्वभावमधुरैरनुभावस्तावकरतितरां तरलाः स्मः / द्यां प्रशाधि गलितावधिकालं साधु साधु विजयस्व विडोजः ! // 24 // आ इति / विडं भेदकम् / विढ भेदने / इगुग्धलक्षणः कः, तदोजो यस्य तस्य सम्बुद्धिः हे विडोजः !, स्वभावमधुरः निसर्गरमणीयैः, तवे मे तायकाः 'तवझमम - कावेकवचने' इत्यणि तादादेशः। तैरनुभवैरैश्चर्यरतितरामत्यन्तम्, अध्ययादा सुप्रत्ययः / तरलाः लोलाः लानन्दलहरोमग्नाः स्म इत्यर्थः। आ इत्यानन्दास्वा. दानुकारः। गलिताधिकालमनन्तकालम् / अत्यन्तसंयोगे द्वितीया। यो स्वर्ग साधु प्रशाधि पालव / माधु, विजयस्व सर्वोत्कृष्टो भव / 'विपराभ्यां नेः' इत्या. स्मनेपदम् // 24 // हे विडोजा! ( व्यापक ते वाले इन्द्र ! ) स्वभावतः मधुर ( दिखावट नहीं ) तुम्हारे प्रभावों ( या भावप्रकाशन या प्रत्यक्षतः अनुभव किये गये कार्यों) से आः मैं अत्यन्त चला. यमान या आश्चर्यित हूँ। अवधिरहित (अनन्त) समय तक अच्छी तरह स्वर्गका शासन करो और
SR No.032781
Book TitleNaishadh Mahakavyam Purvarddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1976
Total Pages770
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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