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________________ नीतिशास्त्र के इतिहास की रूपरेखा/ 33 भी ऐसा विवरण दे पाना उनके लिए सम्भव नहीं हो पाया, जो कि उन्हें संतुष्ट करता। जब वे एक बार ऐसा उत्तर देने के लिए विवश कर दिए गए, तो उन्होंने प्रश्नकर्ता को यह कहकर टाल दिया कि वे ऐसे किसी भी शुभ को नहीं जानते हैं, जो किसी विशेष के लिए शुभ नहीं हो। शुभ आत्मसंगत होता है, सौंदर्य लाभदायक होता है अथवा सद्गुणी सुखी होता है आदि कथनों को वे वास्तविक घटनाओं के द्वारा ही सिद्ध करने का प्रयास करते थे। उनके लिए भलाई करने का अर्थ सर्वकार्य करना और समुन्नत जीवन जीना-दोनों ही था। उनके साथ प्लेटो और अरस्तू के लिए भी यह केवल शाब्दिक अस्पष्टता नहीं, किंतु एक आधारभूत सत्य का प्रकटन था। वे यह मानते हैं कि ज्ञान ही सद्गुण है। आत्मिक शुभ ही सब शुभों में सर्वोपरि हैऔर इन बातों का अनुसरण करने एवं इनका प्रसार करने के लिए व्यक्ति तन्मयतापूर्वक अति कठोर कष्टों एवं अभावों (दारिद्रता) को सहन करते हैं, तो इससे यही सिद्ध होता है कि वे इस बात का दृढ़ता पूर्वक प्रतिपादन कर रहे हैं। विलासपूर्ण जीवन की अपेक्षा ऐसा कठोर (कष्टमय) जीवन अधिक उत्तम है। उन्होंने अपने देश के कानून का उल्लंघन करने की अपेक्षा मृत्यु का वरण कर इस बात का पूर्ण प्रमाण प्रस्तुत कर दिया है। सम्भवतया मृत्यु का आलिंगन करने में उनकी अभिरुचि का यही कारण था। उनके शुभ सम्बंधी दृष्टिकोणों की विविधता परिष्कृत एवं अपरिष्कृत स्थाई भावों के उस विलक्षण संयोग के द्वारा अधिक स्पष्ट हो जाती है, जो कि उनके मित्रता सम्बंधी कथनों में मिलता है। यदि शुभों में आत्मिक शुभ ही सर्वोत्तम है, तो हमारी बाह्य उपलब्धियों में अच्छा मित्र एक सबसे अधिक मूल्यवान् उपलब्धि होगा और ऐसे मित्र को प्राप्त करने का कोई भी प्रयत्न बहुत बड़ी बात नहीं होगी। इसके साथ ही अच्छी मित्रता उसकी उपयोगिता में ही प्रकट होती है। एक ऐसा मित्र, जो किसी काम का नहीं है, निरर्थक है। इस सेवा सम्बंधी कार्य को सुकरात ने सामान्य बुद्धि के अर्थ में ही विवेचित किया है, तथापि वे यह मानते हैं कि नैतिक विकास करना ही एक मित्र की दूसरे मित्र के प्रति की गई सर्वोच्च सेवा है। यह माना जा सकता है कि सुकरात की इस प्रसिद्ध आलोचना के करने में एथेंस के नागरिक पूरी तरह गलत नहीं थे कि एक ऐसा तार्किक है, जिसने युवकों की नैतिकता को गिराया है, किंतु इसके साथ ही सुकरात के अनुयायी भी वहां तक इस आक्षेप का आवेशपूर्ण निराकरण करने में पूरी
SR No.032622
Book TitleNitishastra Ke Iitihas Ki Ruprekha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHenri Sizvik
PublisherPrachya Vidyapeeth
Publication Year2017
Total Pages320
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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