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* पुद्गलो के साथ भेद, जीवों के साथ अभेद रखने के स्थान पर हमने विपरीत किया है ।
तीर्थ के वातावरण में कुछ नवीन मिलेगा, ऐसी आशा से आये होंगे, परन्तु मैंने पुराना ही दिया है । थकान तो नहीं आई न ? नींद तो नहीं आई न ?
आपको चाहे जैसा नहीं, परन्तु आपके लिए हितकारी हो वह प्रदान करे वही सच्चा वैद्य है । मैं आपकी आत्मा को हितकारी बातें देना चाहता हूं ।
प्रभु सभी जीवों के साथ अभेद करके मोक्ष में गये । हम सभी जीवों के साथ भेद करके संसार में भटकते रहे ।
यह बात हम भूल गये हैं, परन्तु ज्ञानी कैसे भूलेंगे ? शरीर में क्या हुआ है या भीतर क्या पड़ा है ? इसका पता हमें नहीं लगता, विशेषज्ञ डाक्टर को तो पता लगता है न ? भगवान विशेषज्ञ
दूर स्थित नहीं दिखनेवाली वस्तु दिखाये वह दूरबीन होती है। अदृश्य एवं अगम्य पदार्थों को दिखाये वे जिनागम हैं । इसीलिए जिनागम को साधु की आंखे कहा गया है । लोगस्स में आप बोलते हैं न । 'एवं मए अभिथुआ ।' "मेरे समक्ष प्रतिष्ठित भगवान की मैंने स्तुति की है ।" भगवान हमारे समक्ष कहां से आये ? श्रुत की आंखों से आये ।।
'भगवान हमारे समक्ष ही है' - ऐसी श्रद्धा से ही चैत्यवन्दन करना है । "सात राज अलगा जइ बैठा पण भगते अम मनमांहि पेठा..." यह बात इसी परिप्रेक्ष्य में कही गई है ।
* जीवास्तिकाय का स्वरूप जानने के पश्चात् 'भगवान मेरे हैं।' ऐसा लगना चाहिये । यही दृष्टि-बिन्दु साधना के लिए महत्त्वपूर्ण
जीवास्तिकाय अनन्त प्रदेशी है । ऐसा प्रथम बार पढ़ने के पश्चात् शंका हुई कि कुछ अशुद्ध तो नहीं है न ? असंख्य के स्थान पर भूल से अनन्त तो नहीं लिखा गया न ? परन्तु आगे टीका आदि में भी 'अनन्त' शब्द का ही प्रयोग था । बाद में लाईट हुई, यह जीव की बात नहीं है, जीवास्तिकाय की बात है। (२९० 80 o ooooooooooooooo कहे कलापूर्णसूरि - २)