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________________ सब कण्ठस्थ करना चाहिये । • मन हमारा सेवक है, फिर भी उस पर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं है । वह स्थिर है कि नहीं ? वफादार है कि नहीं ? आपने कभी पता लगाया है ? अश्व यदि अश्वारोही के नियन्त्रण में न हो तो ? अश्वारोही की दशा क्या होगी ? मन अश्व है । हम अश्वारोही हैं । साधना होनेसे साधु-साध्वीजी मन को सरलता से साध सकते हैं । एकबार भी जाप, स्वाध्याय या भक्ति में मन जुड़ जाये तो उसके आनन्द का रसास्वादन प्राप्त करने की बार-बार इच्छा होगी । जाप आदि में मन यदि जुड़ गया तो स्वयमेव ही स्थिर बन जायेगा । अभी समस्त विकल्पों को रोकने का प्रयत्न नहीं करे, केवल शुभ विचारों में रमण करते रहें । शुभ विचारों से अशुभ विचार हटाइये । उसके बाद शुद्ध भाव से शुभ भाव भी हट जायेंगे, परन्तु अभी का कार्य अशुभ विचारों को हटाने का है । . वाणी एवं काया से किया गया कार्य द्रव्य गिना जाता है, मन से किया गया भाव गिना जाता है । प्रत्येक कार्य के लिए यह समज़ लें । . जयणा कितनी महत्त्वपूर्ण है ? महानिशीथ में प्रश्नोत्तर : भगवन् ! कुशल अणगार का इतना संसार कैसे बढ गया ? 'गौतम ! वह जयणा को जानता नहीं था । जयणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है यह नहीं जानने से, जीवन में नहीं उतारने से उनका संसार बढ गया ।' • भगवान की ओर से कृपा और हमारी ओर से आज्ञा-पालन इन दोनों का मिलन हो जाये तो बेड़ा पार हो जाये । परन्तु हम कहते हैं - भगवान पहले चाहिये । भगवान कहते हैं - प्रथम तुझ में नम्रता चाहिये, आज्ञा-पालन चाहिये। पता नहीं यह 'अनवस्था' कब टलेगी ? भगवान तो कृतकृत्य हैं । हम कुछ करें या न करें, उनका कुछ बनता या बिगड़ता नहीं है, परन्तु हमारे लिए निष्क्रिय रहना अत्यन्त खतरनाक है । हम संसार में फंसे हुए हैं, अतः 'अनवस्था' के इस दुष्चक्र को हमें ही तोड़ना पड़ेगा । हमारी ओर से पहल होनी चाहिये । १ ****************************** २५
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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