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________________ -- कहे कलापूर्णसूरि-३'(गुजराती) पुस्तक का विमोचन, । सा, वि.सं. २०५७ ९-७-१९९९, शुक्रवार आषा. व. ११ * विश्व के समस्त जीवों के साथ जिसने तादात्म्य स्थापित नहीं किया, वह सच्चे अर्थ में प्रभु का स्मरण नहीं कर सकता, परमात्मा नहीं बन सकता । परमात्मा तो क्या, महात्मा भी बन नहीं सकता । * अन्य दर्शनों में भी अत्यन्त ही शुद्ध, स्वीकार करने योग्य विचार प्राप्त होते हैं, इसका कारण यह भी हो सकता है - ऋषभदेव के साथ दीक्षित कच्छ-महाकच्छ बाद में तापस बन गये । उनकी तापसी परम्परा में आदिनाथ की भक्ति के रूप में भक्ति मिल जाये तो कोई आश्चर्य नहीं । . मन नहीं मिलने पर जो क्रिया हो वह होगी द्रव्यनिर्जरा । मन मिलने पर ही भाव-निर्जरा होती है। किसी भी क्रिया में मन तन्मय बने तो ही उसमें प्राणों का संचार होता है । मन ही पुन्य या पाप की क्रियाओं का प्राण हैं । धर्म-क्रियाओं में मन नहीं हो तो वे निष्फल हैं । पाप-क्रियाओं में मन नहीं हो तो वे भी निष्फल हैं, परन्तु हमारी अधिकतर धर्म-क्रियाएं बिना मन की और पाप-क्रियाएं मन सहित होती हैं । यदि आप पाप कहे -१ ****************************** १३
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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