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________________ तुर्मास प्रवेश, वि.सं. २०५५ ८-७-१९९९, गुरुवार आषा. व. १० - अनजान वस्तु की अपेक्षा, ज्ञात वस्तु के प्रति अनन्तगुनी श्रद्धा की अभिवृद्धि होती है । चलते समय प्रथम दृष्टि डालनी या पैर रखना? प्रथम दृष्टि उसके बाद पैर रखें । प्रथम ज्ञान फिर क्रिया - 'पढमं नाणं तओ दया' जवाहिरात का ज्ञान जौहरी सीखे परन्तु दुकान में बैठते समय उसका प्रयोग-उपयोग न करे तो क्या होगा ? जानने के बाद हम उसको क्रियान्वित न करे तो क्या होगा ? थोड़ा विचार करना । . असंग अनुष्ठान का योगी अरूपी का आराधक है । उसके जितनी निर्जरा प्रीतियोग वाला नहीं कर सके, यह स्वाभाविक है, परन्तु प्रारम्भ तो प्रीतियोग से ही होगा । प्रीति के बाद ही भक्ति आती है । जिसे आप चाहते हैं (प्रीति) उसको ही आप समर्पित (भक्ति) हो सकते हैं। जिसको समर्पित हो सकते हैं, उसकी ही बात (वचन) आप मान सकते हैं । जिसकी बात आपके लिए सदा शिरोधार्य है, उसके साथ ही आप एकात्म (असंग) हो सकेंगे, तादात्म्य सध सकेंगे। __ प्रीति एवं भक्ति में पत्नी तथा माता के प्रेम के समान फर्क कहे कलापूर्णसूरि -२ १० ****************************** कहे
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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