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________________ १३-८-१९९९, शुक्रवार श्रा. सु. २ 'एअरपोर्ट' वालों का यही धंधा है : जिसे जहां जाना हो वहां की टिकिट देकर वहां पहुंचा देना । तीर्थंकरों का यही व्यवसाय हैं : जिसे मोक्ष में जाना हो उसका उत्तरदायित्व हमारा । 'एअर-सर्विस' की टिकिट के लिए पैसे चाहिये । यहां पैसों का त्याग चाहिये । अरे, इच्छा मात्र का भी त्याग चाहिये । आज-कल 'ट्रेनों' के संघ निकलते हैं न ? टिकिट आदि का प्रबन्ध संघपति की ओर से होता है । मिलापचन्दजी मद्रास वाले ने एक हजार श्रावकों को रेलगाडी से सम्मेतशिखरजी आदि की यात्रा कराई थी । डेढ करोड रुपये खर्च हुए थे । यहां भी ऐसा ही है । समस्त उत्तरदायित्व भगवान का है । . भगवान का शासन हमें सहनशील, साधनाशील एवं सहायताशील बनाता है । जिस व्यक्ति में ये तीन गुण हों उसे ही साधक कहा जाता है । साधु को प्रतिकूलता में अधिक सुख प्रतीत होता है । संसारी से उल्य 'यदा दुःखं सुखत्वेन', दुःख जब सुख रूप प्रतीत होता है, तब ही साधना का जन्म हुआ माना जाता है । (१५६ ****************************** कहे कलापूर्णसूरि - १)
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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