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________________ बहुत छोटी उम्र में हमें धर्म-संस्कार देनेवाले और हमारे हृदय में दीक्षा की भावना जगानेवाले परम उपकारी मां महाराज के क्षमा, सरलता, सहनशीलता, प्रभु-मंदिर में प्रतिदिन डेढ घंटा जाप, भक्ति एवं ४८ वर्ष की निर्मल संयम-साधना आदि गुणों की जितनी अनुमोदना करें उतनी कम है । स्व. आत्मा परम शान्ति, उच्च गति को प्राप्त करें और मोक्ष-मार्ग की आराधना में आगे बढते हुए मोक्ष की निकट पहुंचे तथा जहां हो वहां से हम पर कृपा-वात्सल्य की वृष्टि बरसाते रहे, इसी प्रार्थना के साथ रुकता हूं । विशेष आज यहां अग्नि-संस्कार (अग्निसंस्कार की बोली हितेशभाई गढेचा ने १४॥ लाख में ली थी । पू. आ. भ. की भी डेढ करोड़ में उन्होंने ही ली थी) तथा जीवदया फंड सब मिल कर लगभग २४ लाख से उपर हुआ है। भरूच संघ तथा कच्छ-वागड़ संघ के भाई, मुंबई, सुरत, नवसारी, अमदावाद आदि से बहुत अच्छी संख्या में आये थे । देव-गुरु-कृपा से सब कार्य उत्साहपूर्वक संपन्न हुए है । विजयकलाप्रभसूरि ज्यादा क्या लिखूं ? घाव के उपर घाव...! हमें एक बात का संतोष है कि पू. बा महाराज अंत समय में मिल गये और हम उनकी समाधि में सहायक बने । पं. कल्पतरुविजय 15
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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