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________________ रहा हूं : वोसिरे... वोसिरे ।' मुंहपत्ति के बोल भी बोल नहीं सकता था । परन्तु भगवान ने मुझे खड़ा कर दिया । एक जन्म में दो जीवन का अनुभव हुआ । मुझे तो इसमें प्रत्यक्ष भगवान की कृपा दृष्टिगोचर होती है । नेल्लोर निवासी निराश हो गये - 'हमारी प्रतिष्ठा का क्या होगा ?' मैंने कहा, 'मैं किसी भी तरह आऊंगा ।' वि.संवत् २०५२ में वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में प्रतिष्ठा भी हो गई । आगमिक पदार्थों को श्रद्धा से ग्रहण किये जा सकते हैं, युक्ति से नहीं । यौक्तिक पदार्थों को तर्क से ग्रहण किया जा सकता हैं । दोनों में यदि गडबडी हो जाये तो ज्ञान की सूक्ष्मता नहीं है, यह समझें । भक्ति का यह पदार्थ श्रद्धागम्य है, अनुभवगम्य है । बिल्ली के बच्चे को माता ने पकड़ लिया तब बच्चे ने क्या किया ? उसने श्रद्धापूर्वक समर्पण किया । यदि समर्पण नहीं किया होता तो ? यदि वह माता के प्रति शंका करता तो ? तो माता उसे बचा नहीं सकती थी । यदि ऐसी शरणागति हममें आ जाये तो ... पूर्व का वैर लेने के लिए रात्रि में नागराज का रूप धारण करके देव आया । गुरु ने शिष्य की छाती पर चढ कर छुरी से रक्त निकाल कर नागराज को दिया । सांप चला गया । शिष्य बच गया । प्रातः काल में पूछने पर शिष्य ने कहा, 'गुरु मेरे तारणहार हैं । वे जो करेंगे वह उचित ही करेंगे । मुझे पूर्ण विश्वास है । शंका या अश्रद्धा का कोई कारण नहीं है।' गुरु को उसकी योग्यता पर आनन्द हुआ । इसका नाम शरणागति । जिस प्रकार बिल्ली एवं बंदरी स्व-सन्तान को अपने समान : बनाती है, उस प्रकार भगवान समर्पित भक्त को स्व-तुल्य बनाते हमारी भक्ति और प्रभु की शक्ति, ये दोनों जुड़ जायें तो काम बन जाये । तस्मिन् (परमात्मनि) परम-प्रेमरूपा भक्तिः - नारदीय भक्ति सूत्र कहे कलापूर्णसूरि - १ ****** १ ****************************** ९७
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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