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________________ संसार की दूसरी नींव है कषाय ।। जैसे कसाई बकरे का कत्ल करता है, उस प्रकार कषाय चारों गतियों के जीवों का कत्ल करते हैं । कषाय के आवेश के समय हम कैसे बन जाते है ? मनवचन-काया कैसे कांपने लगते हैं ? कभी तो स्वस्थतापूर्वक उस रौद्र स्वरूप को देखो | आपको क्रोध पर क्रोध आ जायेगा । १९. 'चिंत्यं देहादिवैरूप्यम्' देह आदि की विरूपता सोचें । आठ वर्ष पूर्व जिन मनुष्यों की देह हमने देखी थी, यदि आज देखते हैं तो स्वरूप कितना परिवर्तित प्रतीत होता है ? देह का यही स्वभाव है, पल-पल में गलना, नष्ट होना । ज्ञानियों का कथन है कि देह नश्वर है अतः आप अनश्वर तत्त्व पर दृष्टि डालो । प.पू. आचार्य भगवंत कलापूर्णसूरिजीना कालधर्मना समाचार वज्रघात समा बन्या ! शासनना ज्योतिर्धर हता। योगना व्योमाकाशमां झळहळता सूर्य हता । तेमना विदायनी कळ हजु वळी नथी । पूज्य कलापूर्णसूरिजीना जीवनना पांच विशिष्ट गुणो में नीचे मुजब जोया छे : (१) अद्भुत अप्रमत्त दशा (अप्रमाद योग) (२) उत्कृष्ट अद्वैतानुभूति आपती भक्ति (३) अप्रतिम करुणादृष्टि अने जीवन (जाणे के क्षायिकना घरनी) (४) गुप्तिसाधक श्रेष्ठ 'कायोत्सर्ग - ध्यान' (५) सर्वश्रेष्ठ संघ मैत्री आ पांचेय गुणो संघमां प्रसार पामे तेवू आपणे (सह) जीवन जीवीए अने तेमनी पासे ए मांगीए । । - शशिकान्तभाईनी वंदना २२-२-२००२ - कहे कलापूर्णसूरि - १ ***** १ ******************************८९
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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