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________________ की एकता भी (अभेद) मन में होनी ही चाहिये । हिन्द महासागर, अरबसागर अथवा बंगाल की खाडी आदि सागर के भेद जानते समय यह बात ध्यान में होनी चाहिये कि सागररूप में सब एक हैं । केवल भौगोलिक स्थिति के कारण नाम भिन्न हैं ।। २. गणितानुयोग ज्ञान के लिए, एकाग्रता से ज्ञान की वृद्धि होती है। ३. चरणकरणानुयोग चारित्र के लिए । ४. कथानुयोग तीनों का फल है। इससे जीव विराधना से बचता है, आराधना में अग्रसर होता है । उत्तराध्ययन आदि में कथानुयोग है । अन्य आये वह गौण । किसी में चारों अनुयोग भी होते है । यह विभागीकरण आर्यरक्षित सूरिजी के द्वारा किया गया था । - 'जिसके पास मैं दीक्षा ग्रहण करूं उसकी आज्ञा का पालन न करूं' उनका विनय न करूं, उनका द्रोह करूं तो क्या मतलब है दीक्षा का ?' भव-भीरु दीक्षार्थी इस प्रकार सोचता है। - गुणहीन को दीक्षा देने से स्व-पर दोनों के भव बिगड़ते हैं । विनीत पुण्यवान, अविनीत पुण्यहीन होता है । सम्पत्ति हो उसे धनवान कहा जाता है । यहां विनय आदि गुण आन्तर सम्पत्ति _ 'नवकार' में 'नमो' की प्रधानता है, वह विनयदर्शक है । यदि अविनीत को शिक्षा दोगे तो वह आप पर ही झपटेगा - 'आप कैसे है ?' वह सब मैं जानता हूं । रहने दो.' उसे आप हजार उपाय करके भी नहीं समझा सकोगे । विनय के बिना विद्या-समकित कहां से ? विनीत व्यक्ति कदापि स्वेच्छानुसार नहीं करेगा । अविनीत व्यक्ति अपनी इच्छानुसार ही सब करेगा । अविनीत विहित नहीं, अविहित अनुष्ठान ही करता रहेगा । कहीं भी घूम आये, कुछ भी कर आये, गड़बड़ कर आये, गुरु को कुछ बतायेगा ही नहीं । गौतम स्वामी ने ३६००० प्रश्न पूछे । हम गुरु को कुछ नहीं पूछते । पूछने जैसा रहा भी नहीं न ? सर्वज्ञ हो गये ! अविनीत, उद्धत को बार-बार टकोर करो तो उसे आतध्यान होता है - 'जब देखो तब टक-टक ! बस मुझ एक को ही देखा १******************************८१
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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