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________________ विम २०५५। २१-७-१९९९, बुधवार __ आषा. सु. ९ * स्वाध्याय योग चित्त की निर्मलता करता है, स्वाध्याय करनेवालों का चित्त अशान्त नहीं हो सकता । सूत्रों का स्वाध्याय एक प्रकार की भक्ति ही है। सूत्रों की रचना किसने की हैं ? प्रभु-भक्ति के द्वारा जिन्होंने भगवान के वचनों को आत्मसात् किया है उन पूवाचार्यों के द्वारा ये सूत्र रचित हैं । कुछ सूत्र तो स्तुतियों के रूप में ही हैं । सम्पूर्ण दण्डक स्तुति स्वरूप ही है। थोसामि सुणेह भो भव्वा 'स्तोष्यामि श्रुणुत भो भव्याः' दण्डक के पदों के द्वारा मैं स्तुति करूंगा । हे भव्यो ! आप श्रवण करें । यह दण्डक का मंगलाचरण है। मोक्ष का अभिलाषी हो वह मुमुक्षु है। उसके लिए वह संसार छोड़ने के लिए तत्पर हो । सच्ची मुमुक्षुता तो तब कही जाती है, जब मोक्ष के उपायों मे सतत प्रवृत्ति दृष्टिगोचर हो । केवल मोक्ष का रटन नहीं चलता, रत्नत्रयी में प्रवृत्ति होनी चाहिये । . भगवान के प्रति बहुमान जागृत करने का कार्य गुरु का है । अध्यात्मवेत्ता गुरु ही आप के अन्तर में भगवान के प्रति बहुमान-भाव उत्पन्न कर सकते हैं। यदि आप अध्यात्मगीता पढेंगे ५४ ****************************** कहे
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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