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प्रथम अध्याय आ पड़ते हैं, उसी उसी भावापन्न हो करके कार्य करते रहते हैं। यह एकलेसाईपना ही गीताका मूल तत्त्व है। ___ इस ३१३८ श्लोकका अन्तर्गत भाव भी ठीक इसी अनुरूप है। साधक अपने प्रतिकूल वृत्तियोंको चेतना-सम्पन्न मनमें निश्चय करके आप ही आप बोलते रहते हैं। एकही अन्तःकरणसे समुदय वृत्तियां उत्पन्न हुई हैं, इसलिये ये सब एकही कुल-सम्भूत हैं। इन सबका कार्य है, आब्रह्मस्तम्ब पर्यन्त विश्वब्रह्माण्डका ज्ञान ला करके चित्तपटमें पहुँचा देना; अतएव यह सब (एकक्रिय) मित्र हैं। प्रभेद का विषय यह है कि, इन सबके भीतर एक अंश केवल मात्र ब्रह्मज्ञानको ला करके चित्तको प्रकाशमान करते हैं, और दूसरे अंश केवल मात्र विषय-ज्ञानको ला करके चित्तको आवरित करते हैं। साधक ब्रह्मज्ञानकी तरफका एक (अर्जुन ) बन करके अपना बनाया हुआ गुरु स्वरूप अपनेको अर्थात् कूटस्थचैतन्य ( जनाईन ) को कहते हैं, यह विषय-ज्ञानके दल समूह लोभके मारे हत-बुद्धि हो गये हैं, इस युद्धके प्रारम्भ होनेसे दोनों पक्षके क्षयहेतु कुलक्षय का दोष, और मित्रबध का पाप होवेगाही, वह इन सबकी नजरमें आता ही नहीं; किन्तु हम लोग जान सुनके इन पापोंसे निवृत्त क्यों न हों? ॥ ३७॥ ३८ ॥
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥३६॥ अन्वयः। कुलक्षय ( सति ) सनातना8 ( परम्पराप्राप्ताः ) कुलधर्माः प्रणश्यन्ति, धर्मे नये (सति) अधर्मः कृतस्नं कुलं उत (अपि ) अभिभवति (आप्नोति ) ॥३९।।
अनुवाद। कुलक्षये होनेसे सनातन कुलधर्म नष्ट होवेगा, धम्म मष्ट होनेसे समस्त कुल अधर्मसे परिपूर्ण हो जावेगा ॥ ३९ ॥
व्याख्या। कुलक्षय-“कु” =शब्दस्पर्शादि विषय “ल” =भोगवासना। विषयभोगवासनाका नाम "कुल" है। विषय दो प्रकारके