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श्रीमद्भगवद्गीता प्रकाशके समयमें कूटस्थचैतन्यको गोविन्द करके भी जानते हैं, फिर मातृभाव ( अहं-ममत्व-ज्ञान करके विषयासक्ति) ले करके कहते हैंराज्य लेके अस्मदादिका क्या होवेगा ? भोगमें प्रयोजन क्य. ? जिन्दा रहनेसे आवश्यक क्या ? जिन लोगोको लेकरके इच्छा करता हूँ कि राज्य-भोग सुख-भोग करूंगा, वही सब तो इस युद्ध में धनप्राणत्याग करेंगे ऐसा ही दिखाई देता है। हे मधुसूदन ! मैं आपही मरू सो भी अच्छा है, इन सबको नष्ट (त्याग ) करनेमें मैं राजी नहीं हूँ। ___ अब देखना चाहिये-"राज्य, भोग, सुख” ये सब कौन चीज हैं ? साधनका उद्देश्य है कि जन्म-मरण रूप संसार-बन्धनसे मुक्त होना, अर्थात् मरत्व परित्याग करके अमरत्व लाभ करना। शरीर षविकार-सम्पन्न है। "अस्ति, जायते, बर्द्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति इति षट विकाराः”। अज्ञानता करके पहिलेसे ही साधककी धारणा है कि साधना करनेसे ही शरीरके वह विकार समूह नष्ट हो जावेंगे, और यह शरीर रूप राज्य उनके स्वायत्त होगा, जितने दिनों इच्छा हो यह राज्य अपने इच्छा अनुसार भोगते रहेंगे
और सुखी होवेंगे; जल स्थल अन्तरीक्षमें रह करके विषय-संगके साथ ब्रह्मानन्द-सुख भोग करते रहेंगे। किन्तु हाथ हथियार करके साधनामें प्रवृत्त होकरके देखते हैं कि, सब ही विपरीत है; पहिले ही उनको बड़े प्यारका भोग-वासना त्याग करना पड़ता है, बादमें अहंकारको जन्म भरके लिये बिदा देना पड़ेगा, और विषय-बुद्धिको एकदम जलांजली देनी होगी; और भी देखते हैं कि, चक्षु-कर्ण-नासिकादि इन्द्रिय-समूह को संयत करके सर्वद्वार निरुद्ध करना होगा, ऐसे कि मनको भी हृदयमें अवरोध करके प्राणको मस्तकमें स्थापन करना पड़ेगा। ऐसे ही सब काम करनेके लिये जब वह गये, तब देखते हैं कि, प्राणान्त करनेवाली शारीरिक यातना है । तब मनमें होता है कि जीवनमुक्तिके