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श्रीमङ्गगवद्गीता
है; और भीष्म जो श्रमास -चैतन्य है, जिनकी मृत्यु वा लय भी नहीं
कहा जा सकता, वही हम सबके रक्षक हैं। परिमित, हम सबसे बहुत ही कम, तथा रक्षक जो सदा च चल और अनिश्चित - प्रताप है ।
और उन सबका दल भीम अर्थात् वायु है,
११ श श्लोक कहनेका हेतुस्वरूप मानो और भी कहा गया कि, - भीष्म कर्णको अर्द्धरथी कहनेके कारण कर्ण ( कर्त्तव्य कर्म ) क्रोध के मारे प्रतिज्ञा कर चुके कि, जितने दिन भीष्म युद्ध करेंगे उतने दिन वह अस्त्र धारण न करेंगे। ( समरांगन में कर्त्तव्य कर्मका अभाव ही दुर्योधन भयका कारण है। ) अतएव :
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥
अन्वयः । भवन्तः सर्वे एव सर्वेषु अयनेषु च यथाभागं अवस्थिताः ( सन्त: ) भीष्मम् एव अभिरक्षन्तु ॥ ११ ॥
अनुवाद | आप सब लोग प्रत्येक व्यूह के प्रवेश द्वार पर अपने अपने विभाग के अनुसार खड़े होकर भीष्मकी ही रक्षा कीजिये ॥ ११ ॥
व्याख्या । " भीष्मकी ही रक्षा कीजिये" कहने का तात्पर्य यह है कि, चिदाभास अर्थात् देहात्माभिमानिता वा अस्मिता के सचेत रहनेसे, हजारों ब्रह्मज्ञानका उपदेश भी किसी तरहसे किसी कालमें वासनाजालको नष्ट न कर सकेगा । "सर्वेषु अयनेषु ” – मूलाधारादि छः चक्रही अयन अर्थात् योगका पथ हैं । प्रत्येक चक्रमें ही प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों पक्ष विद्यमान हैं, यथा :