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पंचम अध्याय
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-भूत और भविष्यत् भी बर्त्तमानके सदृश दृष्टिगोचर होता
* ॥ १६ ॥
तद्वद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्य पुनरावृत्ति ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७ ॥
अन्वयः । (ते ) तबुद्धयः तदात्मानः तन्निष्ठाः तत्परायणाः ज्ञाननिर्धूतकल्मषा: ( सन्तः ) अपुनरावृत्ति गच्छन्ति ॥ १७ ॥
अनुवाद | उस आदित्यवत् ज्ञानमें जिनकी बुद्धि रहता है-चित्त रहता है, उसीमें ही जिन सबकी निष्ठा, और वही जिनकी परमगति है, ज्ञान द्वारा उन सबका कल्मष धौत होनेसे, उन सबको अपुनरावृत्तिगतिकी प्राप्ति होती है ॥ १७ ॥
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* भगवान ६ ष्ठ श्लोकमें "योग बिना संन्यास नहीं होता" यह कथा कहकर देखलाये कि, योगयुक्त होनेसे शीघ्रही तत्त्वातीत होयके ब्रह्म प्राप्ति होता है । फिर शरीर के शेष निःश्वास त्याग न होनेसे स्वभावके वश करके साधक जब तत्वमें उतर आते हैं, तब साधक तत्त्ववित् ( ८म श्लोक ) होते हैं, उनमें एकाधारमें योगयुक्त, विशुद्धात्मा, विजितात्मा, जितेन्द्रिय, सर्वभूतात्मभूतात्मा - इन पांचों अवस्थाओं का समावेश होता है । किन्तु साधनामें उठ जाने के समय ये पांच अवस्था एकके बाद एक क्रम करके पृथक् पृथक् भाषमें होता है । ६-८ श्लोकमें योगफल साधारण भावसे व्यक्त करके, सो सब अजुनको ( साधकको ) विशेष भावसे समझाने के लिये १०-११ श्लोकमें साधनाके ऊद्ध क्रमके प्रणाली और प्रकार कह दिये, तथा १२-१५ श्लोक में उन पांच अवस्था पृथक भावसे वर्णन किये। अंतएव ८म श्लोक के तत्त्ववित् अवस्था भी जो है, इस १६श श्लोकके वर्णित अवस्था भी वही है; दोनों ही एक । इस अवस्था में ही साधक ईश्वर है । परन्तु साधकके ईश्वरत्वमें और जगदीश्वर के ईश्वरत्व में प्रभेद यह है कि, साधक, साधकके क्षुद्र ब्रह्माण्डके ( शरीरके ) ईश्वर; और जगदीश्वर इस वृहत् ब्रह्माण्डके ईश्वर; साधकके लयसे बहिब्रह्माण्डके पंचभूत-निम्मित उनके देहका उपादानका लय नहीं होता, सो सब पंचभूतमें ही पड़ा रहता है, परन्तु जगदीश्वर के लय में समुदायका लय होता है ।। १६ ।।
व्याख्या । ( पूर्वोक्त प्रकार से जो साधक साधना किये हैं, उनका परिणाम क्या होता है, वही इस श्लोक में कहा गया है ) ।