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श्रीमद्भगवद्गीता ( स्व स्वरूपके) साम्ना सामनी देखा देखी अवस्थासे ही इसका उत्थान होता है। उस स्वाध्यायके अन्तस्थित तैलधारा सदृश अच्छिन्न प्रणव-निनाद सुनते सुनते समय तन्मय होकर मायिक आत्महारा होके ( खोके ) असम्प्रज्ञात अवस्था आनेसे, स्वाध्याययज्ञका शेष होता है। इस शेषके भी शेषमें समाहित अवस्था भंग होनेके पश्चात् निरीक्षण करनेसे आब्रह्मस्तम्ब पर्य्यन्त त्रिकालके जो कुछ जाननेके विषय सब जाना जाता है, सर्वत्र ब्रह्म दृष्टि स्थापित होता है; इसीको ही ज्ञानयज्ञ कहते हैं ॥ २८ ॥
अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध, प्राणायामपरायणाः ॥
अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ॥ २६ ॥ अन्वयः। अपरे अपाने ( अपानस्थाने ) प्राणं तथा प्राणे (प्राणस्थान) अपानम् जुह्वतिः ( इत्यादि प्रकारेण ) प्राणापानगती रुद्या प्राणायामपरायणाः ( मवन्ति )। अपरे नियताहाराः ( सन्तः ) प्राणान् ( वायुभेदान् ) प्राणेषु (प्राणभेदेषु एव ) जुह्वति ॥ २९ ॥
अनुवाद। कोई कोई अपानमें प्राण और प्राणमें अपान प्रक्षेप द्वारा प्राणापान की गतिको रोध पूर्वक प्राणायामपरायण होते हैं। और कोई कोई नियताहार हो के प्राणमें ह। प्राणको हवन करते हैं ।। २९॥
व्याख्या। मूलाधारमें अपान और आज्ञामें प्राण अवस्थित (बैठे ) हैं। अपान अधोवृत्तिवायु, प्राण ऊर्द्ध-वृत्तिवायु है, अपान चंचल, प्राणस्थिर है, ये दोनों वायु मेरुके दोनों प्रान्तमें रह करके विपरीत आकर्षणमें परस्परको खींच लेनेके लिये चेष्टा कर रहे हैं । लेकिन कोई किसीको एकबारगी आयत्त कर नहीं सकते इस करके उन दोनोंमें कभी एकका कभी दूसरेका जय पराजयसे निश्वास-प्रश्वास की क्रिया चल रही है। जिस क्षणमें अपानकी खिंचाईसे प्राण निश्चय