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गीताका अधिकार
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सांख्यज्ञानमें अर्थात् संख्यागणना द्वारा सत् और असत्की पृथकवा समझ करके (२य अः) कर्मानुष्ठानमें प्रवृत्त होते हैं (३य अ) उसके बाद कर्ममें अभिज्ञता (ज्ञान ) लाभ करके (४र्थ अः) प्राणापानको समता साधन पूर्वक शुद्धचित्त होके कर्मका वेग नाश करते हैं (५म अः); उसके बाद स्थिर धीर अवस्था प्राप्त होकर ध्यानमें प्रवृत्त होते हैं (६ष्ठ अः) यही छः अध्याय है गीताका कर्मकाण्ड पश्चात् ध्यानके फलसे क्रमानुसार ज्येयवस्तुके सामीप्य प्राप्त होकर साधक ज्ञानविज्ञानविद् होते हैं (ज्म अ.); उसके बाद अपुनावृत्ति गति प्राप्तिके उपाय स्वरूप तारक ब्रह्मयोग अवगत होते हैं (८म अ), तदन्तर. आत्माका जगद्विलास प्रत्यक्ष करके राजविद्या-राजगुह्य योगारूढ़ होकर (हम अः) सर्व विभूति अवगत होते हैं. (१०म अः) परमेश्वरकी विभूति मालूम होते ही मनके उदार हो जानेसे विश्वरूप दर्शन होता है (११श अः ), विश्वरूपमें आत्माका अनन्तरूप दर्शन करके साधनको. भक्ति वा आत्मैकानुरक्तिका चरम विकाश स्वरूप आत्मज्ञान बाभ होता है (१२श अः)। यह छः अध्याय ही गीताका उपासनाकाण्ड है। इसमें कर्म और ज्ञान मिला हुआ है। आत्मज्ञान लाभ होनेसे ही ययाक्रम-प्रकृति-पुरुपकी पुनकता ( १३श अः), गुणत्रयको पृषकताः (-१४स बार, अक्षर और पुरुषोत्तमकी. पृषकता ( १६श अः) दैवासुर-सम्पदकी पृथकता (१६श अः) और श्रद्धात्रयकी पृथकता . (१५श )-इन सब विषयोंका ज्ञान लाभ होता है। उसके बाद सल्यासका तस्व अवयव-होकर साधक सर्वधर्म परित्याहा करके मोक्षलाभ करते हैं ( १८श अः)। यह अन्तिम छः अध्याय ही गीताका ज्ञानकाण्ड है। इससे मालूम होता है कि क्रियावान साधक अब अच्छी तरह समझ सकेंगे कि योजनुष्ठान करने में यही गीता उनका एकमात्र अबलम्बनाई।