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________________ श्री समाध्ययनं को निरर्थक बतलाते हैं । आगे इनके स्वरूप का विशद विश्लेषण किया जायगा । कहने का तात्पर्य यह है कि भिन्न-भिन्न अभिप्राय युक्त मनुष्य यथा रुचि क्रियावाद तथा अक्रियावाद का आश्रय लिये हुए हैं-उन पर टिके हुए हैं । धर्म जो मोक्ष का कारण है, उसे वे नहीं जानते । वे हिंसा आदि आरम्भों से प्रलिप्त तथा इन्द्रियों के अधीन होकर रस-स्वादिष्ट पदार्थ सुख-सुविधा आदि के अभिलाषी ऐसा-यहां तक करते हैं कि अज्ञज्ञानरहित या भोले सद् असद् विवेक से वर्जित सुखाभिलाषी सद्य उत्पन्न शिशु के शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर अपने लिये सुख मानते हैं। इस प्रकार जो दूसरों के लिये उपघात क्रिया-पीडोत्पादक क्रिया करता है, असंयत है, पाप से अनिवृत्त है वह प्राणियों के साथ सैंकड़ों जन्मों तक चलने वाले पारस्परिक उपमर्दन कारक-विनाशकारक शत्रु भाव का संवर्द्धन करता है । यहां 'जायाए बालस्स पगब्भणाए, ऐसा पाठान्तर प्राप्त होता है । उसका अभिप्राय है कि हिंसादि कर्मों में प्रवृत्त-निरनुकम्प-अनुकम्पारहित निर्दय अज्ञ जीव की जो प्रगल्भता है- हिंसामूलक धृष्टता है । उससे प्राणियों के साथ उसका शत्रुभाव प्रवर्धित होता है । आउक्खयं चेव अबुज्झमाणे, ममाति से साहसकारि मंदे । अहो य राओ परितप्पमाणे, अदृसु मूढे अजरामरेव्व ॥१८॥ छाया - आयुःक्षयं चैवाबुध्यमानः, ममत्ववान् स साहसकारिमंदः । अहनि च रात्रौ च परितप्यमानः, अर्थेषु मूढोऽजरामर इव ॥ अनुवाद - वैसा-उपर्युक्त कोटि का आरंभ से संसक्त प्राणी यह नहीं जानता कि उसकी आयु क्षीण होती जा रही है । पदार्थों में उसका ममत्व बना रहता है । वह पाप करते डरता नहीं । वह अपने को अजरवृद्धत्त्व रहित तथा अमर-मृत्यु रहित मानता हुआ अहर्निश धन की चिन्ता में परितप्त रहता है । टीका - अपिच-आयुषो-जीवनलक्षणस्य क्षय आयुष्कक्षयस्तमारभ्यप्रवृत्तः छिन्नह्रदमत्स्यवदुदकक्षये सति अबुध्यमानोऽतीव 'ममाइ' त्ति ममत्ववान् इदं मे अहमस्य स्वामीत्येवं स मन्दः अज्ञः साहसं कर्तुं शीलमस्येति साहसकारीति, तद्यथाकश्चिद्वणिग् महता क्लेशेन महा_णि रत्नानि समासाद्योञ्जयिन्या वहिरावासितः, स च राज चौरदायादभयाद्रात्रौ रत्नान्येवमेवं च प्रवेशयिष्यामीत्येवं पर्यालोचना कुलो रजनीक्षयं न ज्ञातवान्, अन्येव रत्नानि प्रवेशयन् राजपुरुषैरत्नेभ्यश्च्यावित इति, एवमन्योऽपि किंकर्त्तव्यताकुलः स्वायुषःक्षयमबुध्यमानः परिग्रहेप्यारम्भेषु च प्रर्वतमानः साहसकारी स्यादिति, तथा कामभोगतृषितोऽह्नि रात्रौ च परि समन्तात् द्रव्यार्थी परितप्यमानो मम्मणवणिग्वदार्तध्यायी कायेनापि क्लिश्यते, तथा चोक्तम् - "अजरामरवद्वालः,क्लिश्यते धनकाम्यया।शाश्वतं जीवितं चैव,मन्यमानोधनानि च ॥१॥"तदेवमार्तध्यानोपहतः 'कइया वच्चइ सत्थो ? किं भंडं कत्थ कित्तिया भूमी' त्यादि, छाया - कदा व्रजति सार्थः कि भाण्डं क्व च कियती भूमिः । तथा 'उक्खणइ खणइ णिहणह रतिं न सुयइ दियावि य संसको' छाया - उत्खनित खनति निहन्ति रात्रौ न स्वपिति दिवापि च सशंकः । इत्यादि चित्तसंक्लेशात्सुष्ठु मूढोऽजरामरवणिग्वदजरामरवदात्मानं मन्यमानोऽपगतशुभाद्यवसायोऽहर्निशमारम्भे प्रवर्तत इति ॥१८॥ टीकार्थ - हिंसादी आरम्भ में तत्पर जीव यह नहीं जानता कि उसकी आयु क्षीण होती जा रही है। वह उस मछली की ज्यों है, जो सरोवर का बांध टूट जाने पर भी उससे बाहर निकलते जल को नहीं जानती। (459
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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