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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् टीका परिग्रहवतश्चावस्यंभाव्यारम्भस्तस्मिँश्च प्राणातिपात इति दर्शयितुमाह यदिवा-प्रकारान्तरेण ' बन्धनमेवाह-'संयतीत्यादि', सपरिग्रहवानसंतुष्टो भूयस्तदर्जनपरः समर्जितोपद्रवकारिणी च द्वेषमुपगतस्ततः स्वयमात्मन 'त्रिभ्यो' मनोवाक्कायेभ्य आयुर्बलशरीरेभ्यो वा 'पातयेत्' च्यावयेत् प्राणान् प्राणिनः । अकारलोपाद्वा अतिपातयेत् प्राणानिति । प्राणाश्चामी - तथा स परिग्रहाग्रही न केवलं स्वतो व्यापादयति अपरैरपि घातयति घ्रतश्चान्यान् समनुजानीते । तदेवं कृंतकारितानुमतिभिः प्राण्युपमर्द्दनेन जन्मांतरशतानुबन्ध्यात्मनोवैरं वर्धयति, ततश्च दुःखपरम्परारुपाद् बंधनान्नमुच्यत इति । प्राणातिपातस्य चोपलक्षणार्थ तान्मृषावादादयोऽपि बन्धहेतवो द्रष्टव्या इति ॥३॥ - वह परिग्रह को टीकार्थ परिग्रह में रत पुरुष के द्वारा आरम्भ समारम्भ अवश्य होते रहते हैं सुरक्षित रखते और बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार के आरम्भ करता रहता हैं। वैसा करने में हिंसा होती हैं, इसी विषय की आगमकार व्याख्या करते हैं " पञ्चेन्द्रियाणि त्रिविधं बलश्च, उच्छ्वासनिश्वासमथान्यदायुः । प्राणादशैते भगवद्भिरुक्ता स्तेषां वियोगी करणन्तु हिंसा ॥१॥ प्राण यह है प्रकारान्तर से सूत्रकार 'सयं' पद से प्रारम्भ होने वाली इस गाथा के द्वारा बन्धन का स्वरूप बतलाते हैं । परिग्रह में रचापचा मनुष्य कभी संतुष्ट परितृप्त नहीं होता, वह पुनः परिग्रह के अर्जन में- धनादि के संग्रह में तत्पर होता हैं । अपने द्वारा अंर्जित परिग्रह में जो उपद्रव - बाधा उत्पन्न करता है - हानि पहुँचाना चाहता है, उसके प्रति वह परिग्रही पुरुष द्वैष करता है, वह मन वाणी और शरीर द्वारा उस प्राणी के प्राणों का व्याघात करता या उसकी आयु, बल और शरीर इन तीनों का नाश करता है । 'तिवायए' इस पद में अकार का लोप हुआ है, मूलतः यह अतिवायए पद हैं, इसका तात्पर्य प्राणों का अतिपात या क्षय करना है । - - भगवान ने पांच इन्द्रियां, तीन बल, उच्छवास - निच्छवास और आयु ये दस प्राण बतलाये है । इन प्राणों का वियोजन करना हिंसा 1 जिसका परिग्रह में आग्रह है - अत्यधिक आकर्षण होता हैं, वह केवल स्वयं ही प्राणियों की हिंसा नहीं करता औरों द्वारा भी वैसा करवाता है । जो हिंसा में लगे होते हैं, उनका अनुमोदन करता है । इस प्रकार कृतकारित एवं अनुमोदित स्वयं करना, दूसरे से करवाना, करते हुए का समर्थन करना, यों तीन प्रकार से प्राणियों की हिंसा करने के फलस्वरूप वह उनसे सैकड़ो जन्मों तक टिकने वाले शत्रुभाव की वृद्धि करता है । उस कारण वह दुःखों की परम्परा से जुड़े हुए बंधन से छूट नहीं पाता। यहाँ प्राणातिपात के उपलक्षण-संसूचन द्वारा मृषावाद असत्य आदि से सम्बद्ध बंधन के कारणों को भी समझना चाहिए । - जस्सिं कुले समुप्पन्ने जेहिं वा संवसे नरे । ममाइ लुप्पड़े बाले अण्णे अण्णेहि मुच्छिए ॥४॥ छाया यस्मिन्कुले समुत्पन्नौ यै र्वा संवसेन्नरः । ri लुम्यते बालः अन्येष्वन्येषु मूर्च्छितः ॥४॥ 4
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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