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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् छाया - यैः काले पराक्रान्तं, न पश्चात् परितप्यन्ते । ते धीरा बन्धनोन्मुक्ताः, नावकाङ्क्षन्ति जीवितम् ॥ अनुवाद - जिस समय धर्म की आराधना में पराक्रम-उद्यम किया जाना चाहिए जिन पुरुषों ने वैसा किया वे बाद में पश्चाताप नहीं करते, उन्हें पछतावा नहीं करना पड़ता, वे बन्धन मुक्त, धीर-आत्मबल युक्त पुरुष संयम रहित जीवन की आकांक्षा नहीं करते ।। टीका - ये तूत्तमसत्त्वतया अनागतमेव तपश्चरणादावुद्यमं विदधति न ते पश्चाच्छोचन्तीति दर्शयितुमाह'यैः' आत्महितकर्तभिः 'काले' धर्मार्जनावसरे 'पराक्रान्तम' इन्द्रियकषायपराजयायोद्यमोविहितो मरण काले वृद्धावस्थायां वा 'परितप्यन्ते' न शोकाकुला भवन्ति, एकवचननि शेस्तु सौत्रश्च्छान्दसत्वादिति, धर्मार्जनकालस्तु विवेकिनां प्रायशः सर्व एव यस्मात्स एव प्रधानपुरुषार्थः, प्रधान एव च प्रायशः क्रियमाणो घटां प्राञ्चति, ततश्च ये बाल्यात्प्रभृत्यकृतविषयासङ्गतया कृततपश्चरणाः ते 'धीराः' कर्म विदारण सहिष्णवो बन्धनेन-स्नेहात्मकेन कर्मणा चोद्-प्राबल्येन मुक्ता नावकाङ्क्षन्ति' असंमजीवितं, यदिवा-जीविते मरणे वा निःस्पृहाः संयमोद्यममतयो भवन्तीति ॥१५॥ अन्यच्च - टीकार्थ - जो मनुष्य उत्तम सत्व-उच्च पराक्रमशील होते हैं वे पहले ही तपश्चरण आदि में उद्यम करते हैं । उन्हें बाद में पछताना नहीं पड़ता । इसका दिग्गदर्शन कराने हेतु सत्र का प्रतिपादित करते हैं, आत्महितआत्मकल्याण साधित करने वाले जिन पुरुषों ने धर्म अर्जित करने की वेला में इन्द्रियों तथा कषायों को जीतने हेतु उद्यम किया वे बाद में-मरते समय या बुढ़ापे में परितप्त-शोकाकुल नहीं होते। यहाँ प्रयुक्त परितप्य-परितप्यन्ते पद में एक वचन निर्देश सूत्र होने के कारण आर्ष प्रयोग है, ऐसा समझना चाहिए । जो पुरुष विवेकशील है उनके लिए प्रायः सारा ही समय धर्म अर्जित करने का है क्योंकि धर्म का अर्जन ही मुख्य पुरुषार्थ है । अत: मुख्य पुरुषार्थ के लिए उद्यत रहना-प्रयत्नशील रहना सर्वोत्तम है। जो मानव बचपन से ही सांसारिक विषय भोगों के सम्पर्क में न आते हुये तप में प्रवृत्त रहते हैं वे कर्मों को विदीर्ण करने में-उच्छिन्न कर डालने में समर्थ होते हैं, उनमें वैसा आत्मबल होता है । वे मानव स्नेहात्मक-मोहयुक्त बंधन से अत्यन्त विमुक्त रहते हैं, असंयम मय जीवन की कामना नहीं करते अथवा वे जीवन या मृत्यु में जरा भी स्प्रीहा-अभिलाषा न रखकर संयम पालन में दत्तचित्त हैं। जहा नई वनेयरणी, दुत्तरा इह संमता । . एं लोगंसि नारीओ, दुरूत्तरा अमईमया ॥१६॥ छाया - यथा नदी वैतरणी दुस्तरेह सम्मता । एवं लोके नार्यो दुस्तरा अमतिमता ॥ अनुवाद - जैसे वैतरणी नदी दुस्तर है उसे पार कर जाना बहुत कठिन है उसी तरह मतिहीनविवेक रहित पुरुष के लिए स्त्रियां दुस्तर है ।। टीका - यथेत्युदाहरणोपन्यासार्थः, यथा वैतरणी नदीनां मध्येऽत्यन्तवेगवाहित्वात् विषमतटत्वाच्च 'दुस्तरा' दुर्लङ्घया 'एवम्' अस्मिन्नपि लोके नार्यः 'अमतिमता' निर्विवेकेन हीनसत्त्वेन दुःखनोत्तीर्यन्ते तथाहि - ताः हावभावैः कृतविद्यानपि स्त्रीकुर्वन्ति, तथा चोक्तम् - (256)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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