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________________ उपसर्गाध्ययनं. युद्ध में बहुत बड़े-बड़े शौर्यशाली योद्धा एकत्रित हैं अतएव कौन जाने किसकी इसमें पराजय हो, क्योंकि कभीकभी ऐसा होता है कि थोड़े पुरुष भी बुहसंख्यक जनों पर विजय प्राप्त कर लेते है, कार्य की सफलता देव के अधीन है। मुहुत्ताणं मुहुत्तस्स, मुहुत्तो होइ तारिसो । पराजियाऽवसप्पामो, इति भीरू उवेहई ॥२॥ छाया - मुहूर्ताणां मुहूर्तस्य मुहूर्तो भवति तादृशः । पराजिता अवसाम इति भीरू रूपेक्षते ॥ अनुवाद - बहुत से मुहूर्तो में या कोई एक ही मुहूर्त में ऐसी घड़ी आ सकती है जो जय या पराजय को संभव बना दे । इसलिए हम पराजित होकर जहां जा सके, छिप सके, ऐसे स्थान को भीरू-कायर जन पहले से ही देखे रखते हैं । टीका - किञ्चमुहूर्तानामेकस्य वा मुहूर्तस्यापरो 'मुहूर्त:' कालविशेषलक्षणोऽवसरस्तादृग् भवति यत्र जयः पराजयो वा सम्भाव्यते, तत्रैवं व्यवस्थिते पराजिता वयम् 'अवसर्पामो' नश्याम इत्येतदपि सम्भाव्यते अस्मद्विधानामिति भीरू: पृष्ठत आपत्प्रतीकारार्थं शरणमुपेक्षते ॥२॥ इति श्लोकद्वयेन दृष्टान्तं प्रदर्श्य दार्टान्तिकमाह ____टीकार्थ - बहुत से मुहूर्तो में अथवा किसी एक ही मुहूर्त में कोई ऐसा काल विशेष-अवसर आ सकता है, जिसमें जय या पराजय संभावित हो जाय-घटित हो जाय ऐसी स्थिति में, पराजित होकर भागकर हमें कहीं छिपना पड़े, ऐसा सोचकर भीरू-डरपोक व्यक्ति पहले ही आगे आने वाली आपत्ति का प्रतीकार करने हेतु शरण-रक्षा योग्य स्थान की गवैषणा करता है, ढूंढता है । इन दो दृष्टान्तों को प्रदर्शित कर सूत्रकार अब उनका सारांश प्रकट करते हैं। एवं तु समणा एगे, अबलं नच्चाण अप्पगं । अणागयं भयं दिस्स, · अविकप्पंतिमं सुयं ॥३॥ छाया - एवं तु श्रमणा एक अबलं ज्ञात्वाऽऽत्मानम् । अनागतं भयं दृष्ट्वाऽवकल्पयन्तीदं श्रुतम् ॥ अनुवाद - कई श्रमण यह सोचकर कि जीवन पर्यन्त हम संयम पालन में समर्थ नहीं हो सकेंगे, आगामी काल में संभावित कष्टों से बचने के लिए वे अन्यश्रुत लोकोपयोगी शास्त्रों का अभ्यास कर अपनी रक्षा का साधन बनाते हैं । __टीका - ‘एवम्' इति यथा सङ्ग्रामं प्रवेष्टुमिच्छुः पृष्ठतोऽवलोकयति-किमत्र मम पराभग्नस्य वलयादिकं शरणं त्राणाय स्यादिति ?, एवयेव 'श्रमणाः' प्रव्रजिता 'एके' केचनादृढमतयोऽल्पसत्त्वा आत्मानम् 'अबलं' यावजीवं संयमभारवहनाक्षमं ज्ञात्वा अनागतमेव भयं दृष्ट्वा' उत्प्रेक्ष्य तद्यथा-निष्किञ्चनोऽहं किं मम वृद्धावस्थायां ग्लानाद्यवस्थायां दुर्भिक्षे वा त्राणाय स्यादित्येवमाजीविका भयमुत्प्रेक्ष्य 'अवकल्पयन्ति' परिकल्पयन्ति मन्यन्ते 1225
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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