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________________ श्री सूत्रकृताङ्गसूत्रम् टीका - अनन्तरोपन्यस्तवार्तोपसंहारार्थमाह-भिक्षूणां-साधूनामुधुक्त विहारिणां चर्या दशविधचक्रवाल सामाचारी इच्छामिच्छेत्यादिका तया चोदिताः - प्रेरिता यदिवा भिक्षुचर्यया करणभूतया सीदन्तश्चोदिताः-तत्करणं प्रत्याचार्यादिकैः पौनः पुन्येन प्रेरितास्तच्चोदनामशक्नुवन्त: संयमानुष्ठानेनात्मानं 'यापयितुं' वर्तयितुमसमर्थाः सन्त: 'तत्र' तस्मिन् संयमे मौक्षेकगमनहेतौ भवकोटिशतावाप्ते 'मन्दा' जडा 'विषीदन्ति' शीतलविहारिणो भवन्ति. तमेवाचिन्त्यचिन्तामणिकल्पं महापुरुषानुचीर्णं संयम परित्यजन्ति, दृष्टान्तमाह-ऊर्ध्वं यानमुद्यानं-मार्गस्योन्नतो भाग उट्टङ्क मित्यर्थः तस्मिन् उद्यानशिरसि उत्क्षिप्तमहाभरा उक्षाणोऽतिदुर्बला यथाऽवसीदन्ति-ग्रीवां पातयित्वा तिष्ठन्ति नोत्क्षिप्तभरनिर्वाहका भवन्तीत्येवं तेऽपि भावमन्दा उत्क्षिप्तपञ्चमहाव्रतभारं वोढुमसमर्थाः पूर्वोक्तभावावतैः पराभग्ना विषीदन्ति ॥२०॥ किञ्च - टीकार्थ - आगमकार अब पूर्व वर्णित बातों का उपसंहार कर प्रतिपादित करते हैं - शास्त्रीय विधि के अनुसार विचरणशील साधु के लिए दस प्रकार की समाचारी का विधान है, जो तलवार की तेजधार के समान बड़ी तीक्ष्ण और दुर्वह है, जिसका ‘इच्छा मिच्छा' इत्यादि द्वारा निरूपण हुआ है, उसे भिक्षुचर्या कहा जाता है । उस भिक्षाचर्या का पालन करने हेतु गुरु आदि प्रेरित करते रहते हैं, अथवा उस भिक्षुचर्या के अनुसरण में साधकों को कष्ट पाता देखकर आचार्य आदि पुनः पुनः प्रेरित करते हैं, किन्तु कतिपय साधु उस प्रकार की प्रेरणा पाकर भी उस कठोरता को सहन करने में अपने को असमर्थ पाते हैं । संयम का पालन करते हुए साधु जीवन का सम्यक निर्वाह करने में असमर्थ अज्ञानी पुरुष उस संयम के परिपालन में शिथिल हो जाते हैं, जो करोड़ों भवों के पश्चात् प्राप्त हुआ, जो मोक्ष प्राप्ति का मुख्य साधन है । वे मन्दजड़ या अज्ञानी उस संयम का परित्याग कर देते हैं, जिसका महापुरुष आचरण करते रहे हैं, जो चिन्तामणि रत्न के सदृश अचिन्त्य प्रभावयुक्त है । इस संबंध में एक दृष्टान्त प्रस्तुत किया जाता है-उत् + यान = उद्यानमार्ग के उच्च भाग को उद्यान कहा जाता है । जो बैल भारी बोझ से दबे हुए हों, शक्तिहीन हों, उस उच्च भाग की ओर आगे बढ़ते हुए, हारकर अपनी गर्दन को नीचे कर बैठ जाते हैं । अपने पर लादे हुए बोझ को ढोने में वे अक्षम हो जाते हैं, उसी प्रकार वे अज्ञानी व्यक्ति भी अपने द्वारा स्वीकृत पांच महाव्रतात्मक भार को ढोने में-उसको लेकर साधना के उच्चमार्ग में आगे बढ़ते रहने में असमर्थ हो जाते हैं । पहले स्त्री आदि जिन भाववों का वर्णन हुआ है, उनसे विचलित होकर संयम का परित्याग कर देते हैं । अचयंता व लूहेणं, अवहाणेण तजिया । तत्थ मंदा विसीयंति, उजाणंसि जरग्गवा ॥२१॥ छाया - अशक्नुवन्तो रूक्षेण, उपधानेन तर्जिताः । तत्र मंदाः विषीदन्ति उद्याने जरद्वाः । अनुवाद -, त्याग मय जीवन का निर्वाह करने में असमर्थ, तपश्चरण से तर्जित-भयभीत, डरने वाले मंद अज्ञानी पुरुष संयम के उच्च पथ पर आगे बढ़ते हुए उसी तरह विषण्ण या परिश्रान्त हो जाते हैं, जैसे ऊँचे रास्ते पर आगे बढ़ता हुआ वृद्ध बैल । टीका - 'रूक्षेण' संयमेनात्मानं यापयितुमशक्नुवन्तः तथा 'उपधानेन' अनशनादिना सबाह्याभ्यन्तरेण तपसा 'तर्जिता' बाधिताः सन्तः तत्र संयमे मन्दा विषीदन्ति 'उद्यानशिरसि' उदृङ्कमस्तके 'जीर्णो' दुर्बलो गौरिव, यूनोऽपि हि तत्रावसीदनं सम्भाव्यते किं पुनर्जरगवस्येति जीर्णग्रहणम्, एवमावर्तमन्तरेणापि धृतिसंहननोपेतस्य विवेकिनोऽप्यवसीदनं सम्भाव्यते, किं पुनरावर्तरूपसर्गितानां मन्दानामिति ॥२१॥ 2220 -
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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