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________________ उपसर्गाध्ययनं भवन्ति संयमाद्वा भ्रश्यन्ति, यथा भीरवः 'संग्रामे' रणशिरसि चक्रकुन्तासि शक्ति नारा चाकुले रतत्पटहशङ्खझल्ल रीनादगम्भीरे समाकुलाः सन्तः पौरूषं परित्यज्यायशः पटहमङ्गीकृत्य भज्यन्ते, एवमाक्रोशादिशब्दाकर्णनादल्प सत्त्वाः संयमे विषीदन्ति ॥७॥ वध परीषह मपि कृत्याह - टीकार्थ - जो पुरुष लघुप्रकृति-तुच्छ स्वभाव युक्त होते हैं, मूर्ख होते है वे गांव, शहर या उनके बीच के भाग में पहले कहे गए निन्दामूलक तथा चौर्य, व्यभिचार आदि के आरोप से युक्त शब्द सुनकर उनको सहने में असमर्थ, अक्षम हो जाते हैं, खिन्न हो जाते हैं, संयम् के मार्ग से पतित हो जाते हैं । जैसे युद्ध में कायर पुरुष चक्र, कुन्त-भाले, असि-तलवार शक्ति-तीक्ष्ण नोकयुक्त, त्रिशूल आदि शस्त्र एवं बाण आदि से आकुल तथा वहाँ बजते हुए पट: ढोल नगारे, शंख झालर आदि की गडगडाहट से घबराकर अपने पौरूषसाहस का परित्याग करते हुए अपकीर्ति स्वीकार कर भाग उठते हैं । इसी प्रकार आक्रोश युक्त शब्दों को सुनकर अल्पसत्व-अत्यन्त न्यून आत्म पराक्रमयुक्त, साहसहीन साधु संयम् पालन में विषाद करते हैं-घबरा उठते हैं, उसे छोड़ भागते हैं। अप्पेगे खुधियं भिक्खू, गुणी डंसति लूसए । तत्थ मंदा विसायंति, तेउपट्ठा व पाणिणो ॥८॥ छाया - अप्येकः क्षुधितं भिक्षु सुनीदंशति लूषकः । तत्र मंदाः विषीदंति तेजस्पृष्टा इव प्राणिनः ॥ अनुवाद - क्षुधित-भूखयुक्त या आहारापेक्षी साधु को भिक्षा हेतु घूमते समय कोई क्रूर कुत्ता आदि काटले तो उस समय मन्द विवेक रहित साधु एस प्रकार दुःखी हो जाते है, जैसे आग से छू जाने पर प्राणी व्याकुल हो उठते है । टीका - 'अप्पेगे' इत्यादि, अपिः संभावने एकः कश्चिच्छवादिः लूषयतीति लूषकः प्रकृत्यैव क्रूरो भक्षकः खुधियंति क्षुधितं-बुभुक्षितं भिक्षामट्टन्तं भिक्षु 'दशति' भक्षयति दशनैरङ्गावयवं विलुम्पति, 'तत्र' तस्मिन् श्वदिभक्षणे सति 'मंदा' अज्ञा अल्पसत्त्वतया 'विषीदन्ति' दैन्यं भजन्ते, यथा 'तेजसा' अग्निना 'स्पृष्टा' दह्यमानाः 'प्राणिनो' जन्तवो वेदनार्ताः सन्तो विषीदन्ति गात्रं संकोचयन्त्यार्तध्यानोपहता भवन्ति, एवं साधुरपि क्रूर सत्त्वैरभिद्रुतः संयमाद् भ्रश्यत इति, दुःसहत्वाद्ग्रामकण्टकानाम् ॥८॥ पुनरपि तानाधिकृत्याह - टीकार्थ - इस गाथा में 'अपि' शब्द संभावना मूलक है । कोई कुत्ता आदि प्राणी स्वभाव से ही क्रूर होता है । वह भूख से युक्त आहारार्थी भिक्षा के लिए भ्रमण करते हुए किसी साधु को काटने लगे, अपने दांतों से उसके अंगों को विदीर्ण करने लगे तब कुत्ते आदि के द्वारा काटे जाते समय मन्द-बुद्धि विवेक शून्य साधु दीन हो जाते है, भय से घबरा जाते है । जिस प्रकार आग से जलते हुए प्राणी पीड़ा से आर्त-व्यथित होकर शोक करने लगते हैं, अपने अंगों को सिकोड़ते हुए आर्तध्यान करते हैं, उसी तरह वे साधु भी निर्दय प्राणियों से अभिद्रूत-आक्रान्त होकर संयम से भ्रष्ट हो जाते हैं, क्योंकि गाँवों से ऐसे विघ्नों को सहना बड़ा मुश्किल होता है । 203
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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